
स्ट्रेट ऑफ होरमुज में शनिवार को दो भारतीय झंडे वाले जहाजों पर ईरानी नौसेना ने गोलीबारी कर दी। इस घटना ने ईरान की सत्ता संरचना में गहरी दरार को उजागर कर दिया है।
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराग़ची ने कुछ घंटे पहले ही घोषणा की थी कि लेबनान में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्धविराम के बाद होरमुज जलडमरूमध्य व्यावसायिक जहाजों के लिए पूरी तरह खुला है। लेकिन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने तुरंत पलटवार करते हुए जहाजों को रोका और गोली चलाई। दोनों जहाजों को वापस मुड़ना पड़ा। एक सुपरटैंकर में लगभग 20 लाख बैरल इराकी तेल था।
भारत ने इस घटना पर गंभीर आपत्ति जताते हुए ईरानी राजदूत मोहम्मद फतहाली को तलब किया और “गहरी चिंता व नाराजगी” व्यक्त की।
IRGC का दबदबा साफ
विदेश मंत्रालय की घोषणा के बावजूद IRGC ने कहा कि जहाजों को उसके साथ समन्वय करना होगा। IRGC से जुड़े मीडिया (तस्नीम और फार्स) ने अराग़ची के बयान को “अधूरा और भ्रामक” बताया।
विश्लेषकों का कहना है कि ईरान में सिविल सरकार कूटनीति और आर्थिक राहत चाहती है, जबकि IRGC सख्त रुख और नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। होरमुज पर IRGC का व्यावहारिक नियंत्रण है, जो विश्व के 20 प्रतिशत तेल परिवहन का रास्ता है। भारत के लिए भी यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से 90 प्रतिशत गैस आयात होता है।
यह घटना ईरान में “हेरार्किकल” सत्ता व्यवस्था को दिखाती है, जहां कई केंद्र शक्ति रखते हैं और कोई एक पूरी तरह नियंत्रण में नहीं है।
अभी दो सप्ताह का नाजुक युद्धविराम बुधवार को खत्म होने वाला है। अमेरिका की नाकेबंदी और IRGC की सख्ती से बातचीत जटिल बनी हुई है।



