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कल्पक्कम का परमाणु चमत्कार: अमेरिका और फ्रांस असफल, भारत ने कर दिखाया!

भारत ने परमाणु क्षेत्र में एक बड़ी सफलता हासिल की है। तमिलनाडु के कल्पक्कम में ५०० मेगावाट प्रोटोटाइप फास्ट ब्रेडर रिएक्टर (पीएफबीआर) ने ६ अप्रैल २०२६ को पहली बार क्रिटिकलिटी हासिल कर ली। इसका मतलब है कि रिएक्टर में स्वयं-संचालित न्यूक्लियर चेन रिएक्शन शुरू हो गया है।

यह उपलब्धि इसलिए खास है क्योंकि अमेरिका और फ्रांस जैसे बड़े देश अरबों डॉलर खर्च करने के बावजूद फास्ट ब्रेडर रिएक्टर को वाणिज्यिक स्तर पर सफलतापूर्वक नहीं चला पाए। केवल रूस ही दुनिया में ऐसा रिएक्टर व्यावसायिक रूप से चला रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत की सिविल न्यूक्लियर यात्रा में एक परिभाषित कदम बताया।

भारत में यूरेनियम कम है लेकिन थोरियम के विशाल भंडार हैं। कल्पक्कम का यह रिएक्टर ईंधन से ज्यादा ईंधन पैदा करता है। शुरू में यह प्लूटोनियम-आधारित ईंधन पर चलेगा और बाद में थोरियम का उपयोग संभव हो सकेगा। इससे देश की यूरेनियम आयात पर निर्भरता कम होगी और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।

यह सफलता डॉ. होमी जहांगीर भाभा द्वारा कल्पित तीन चरण वाले न्यूक्लियर कार्यक्रम की दूसरी मंजिल में भारत के प्रवेश का प्रतीक है। पूर्ण रूप से चालू होने पर यह रिएक्टर करीब तीन मिलियन घरों को बिजली दे सकेगा और भविष्य के रिएक्टरों के लिए अतिरिक्त ईंधन भी बनाएगा।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भारत और इसके वैज्ञानिकों को बधाई दी है। यह उपलब्धि स्वच्छ और विश्वसनीय बिजली उत्पादन को बढ़ावा देगी तथा २०४७ तक १०० गीगावाट न्यूक्लियर पावर के लक्ष्य को करीब लाएगी। हर भारतीय को इस वैज्ञानिक उपलब्धि पर गर्व होना चाहिए।

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