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लड़खड़ाते बचपन को संवारने की मुहिम में जुटी दो महिलाएं!

लड़खड़ाते बचपन को संवारनेभोपाल। अब से 32 वर्ष पूर्व घटित हुई भोपाल गैस त्रासदी ने जहां हजारों परिवारों को तोड़ दिया, वहीं इस त्रासदी के बाद दो महिलाओं को पीड़ितों की मदद का जज्बा भी मिला। दोनों महिलाओं ने इस हादसे में मिले जख्म भरने के लिए लड़खड़ाते बचपन को संवारने की मुहिम शुरू कर दी। उनका अभियान साल-दर-साल नए मुकाम हासिल करने के साथ ही उन बच्चों की जिंदगी में बड़ा बदलाव ला रहा है, जो सुन-बोल नहीं सकते और बगैर सहारे के एक कदम भी चल नहीं सकते हैं।

राजधानी के डीआईजी बंगले के करीब स्थित एक बहुमंजिला इमारत के निचले तल में स्थित चिंगारी ट्रस्ट के पुर्नवास केंद्र में पहुंचते ही अहसास हो जाता है कि यहां उन बच्चों का जीवन संवारा जा रहा है, जिन्हें वाकई दूसरे की मदद की दरकार है। यहां बोलने, सुनने में अक्षम, शरीरिक व मानसिक तौर पर विकलांग बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाने के काम में दक्ष प्रशिक्षक लगे हुए हैं।

रशीदा बी और चंपा देवी ने वर्ष 2004 में इस केंद्र की शुरुआत की थी। दोनों महिलाओं के रिश्तेदारों को भी जहरीली गैस ने जख्म दिए थे। चंपा देवी के बेटे के यहां बेटी का जन्म हुआ तो उसके होठ, तालू व दांत के मंसूड़े तक नहीं थे, और ठीक इसी तरह रशीदा बी की बहन की बेटी विकलांग पैदा हुई।

दोनों महिलाओं ने गैस व प्रदूषित पानी पीड़ित क्षेत्रों में विकलांगता के शिकार परिवारों के लिए अभियान चलाया, मगर उनके लिए आर्थिक मदद कर पाना संभव नहीं था। इसी दौरान उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए वर्ष 2004 में संयुक्त रूप से अमेरिका में गोल्डमेन एन्वायरमेंट पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार में एक लाख पच्चीस हजार डॉलर मिले। इस राशि से दोनों ने विकलांग बच्चों के पुनर्वास का काम शुरू करने का फैसला किया।

रशीदा बी बताती है, “केंद्र में लगभग 800 बच्चे पंजीकृत हैं, मगर प्रतिदिन यहां ढाई सौ बच्चे ही आते हैं। इन बच्चों को बीमारी के मुताबिक अलग-अलग वगरें में बांट कर इलाज किया जाता है। यहां स्पीच थैरेपी, फिजियो थैरेपी, आक्यूपेशनल थैरेपी, स्पेशल एज्यूकेशन और मल्टी थैरेपी की सुविधा है। बच्चों को घर से लाने और छोड़ने के लिए वाहन हैं, तथा उन्हें मध्याह्न् भोजन भी दिया जाता है। सबकुछ बगैर सरकारी मदद के चल रहा है।”

चंपा देवी के मुताबिक, “यहां आने वाले बच्चों के साथ उनके पालक भी आते हैं। बच्चों को पूरी सुविधा दी जाती है। दक्ष विशेषज्ञ इन बच्चों का इलाज करते हैं। बीते 11 वषरें में गैस व प्रदूषित पानी पीड़ित क्षेत्रों में नवजात शिशुओं में विकलांगता का प्रतिशत अन्य स्थानों के मुकाबले कहीं ज्यादा है।”

केंद्र के फिजियो थैरेपिस्ट डॉ. संजय गौर का कहना है, “यहां डिले डेवलपमेंट, मस्कुलर डिस्टापी, डाउन सिंड्रॉम, सेरिब्रल पॉल्सी, मल्टीपल डिस्टॉफी से ग्रसित बच्चे आते हैं, और उन्हें पूरी तरह स्वस्थ्य होने में वक्त लगता है। मगर असर कुछ ही समय में नजर आने लगता है।”

डॉ. गौर के मुताबिक, “इस केंद्र में शून्य से 12 वर्ष तक की आयु के बच्चों का उपचार किया जाता है। कई बच्चे ऐसे हैं, जो पूरी तरह सेहतमंद हो गए और आम बच्चों की तरह जिंदगी जीने लगे हैं।”

ज्ञात हो कि यूनियन कार्बाइड संयंत्र से दो-तीन दिसंबर, 1984 की दरम्यानी रात रिसी मिथाइल आइसो सायनाइड (मिक) गैस ने तीन हजार से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। इसके साथ ही हजारों लोगों को ऐसी बीमारियां दीं, जिनके कारण वे जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करने को मजबूर हैं। गैस पीड़ित परिवारों में विकलांग व अपंग बच्चे जन्म ले रहे हैं।

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