वसुंधरा सरकार ने पेश किया विवादित अध्यादेश, विरोध में उतरे भाजपा विधायक

वसुंधरा सरकारजयपुर। वसुंधरा सरकार ने विवादित अध्यादेश विधानसभा में पेश कर दिया है। इस दौरान सदन में भारी हंगामे के चलते विधानसभा की कार्यवाही मंगलवार तक के लिए स्थगित कर दी गई है। सदन में कांग्रेस नेताओं के साथ बीजेपी के भी दो नेताओं घनश्याम तिवारी और एन रिजवी ने इस बिल का विरोध किया।

भाजपा शासित राज्य की वसुंधरा सरकार के इस के पास हो जाने के बाद अब जजों, न्यायिक अधिकारियों, अफसरों और लोक सेवकों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराना मुश्किल हो जाएगा।

वसुंधरा राजे सरकार की ओर से लाए गए इस संसोधन अध्यादेश के मुताबिक, अब कोई भी व्यक्ति जजों, अफसरों और लोक सेवकों के खिलाफ अदालत के जरिये एफआईआर दर्ज नहीं करा सकेगा।

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मजिस्ट्रेट बिना सरकार की इजाजत के न तो जांच का आदेश दे सकेंगे न ही प्राथमिकी का दर्ज कराने का आदेश दे सकेंगे। इसके लिए उसे पहले सरकार से मंजूरी लेनी होगी।

अध्यादेश में कहा गया है कि सरकार के स्तर पर सक्षम अधिकारी को 180 दिन के अंदर जांच की इजाजत देनी होगी। अगर 180 दिन के अंदर जांच की इजाजत नहीं दी जाती है तो इसे स्वीकृत मान लिया जाएगा।

अध्यादेश में यह भी कहा गया है कि किसी भी जज, मजिस्ट्रेट या लोकसेवक का नाम और पहचान मीडिया तब तक जारी नहीं कर सकता है जब तक सरकार के सक्षम अधिकारी इसकी इजाजत नहीं दें। क्रिमिनल लॉ राजस्थान अमेंडमेंट ऑर्डिनेंस 2017 में साफ तौर पर मीडिया को लिखने पर रोक लगाई गई है।

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राज्य के गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया इसके बचाव में कहते हैं कि, ईमानदार अधिकारी को बचाने के लिए हम ये अध्यादेश लाए हैं।

इस बीच ‘दंड विधियां (राजस्थान संशोधन) अध्यादेश, 2017’  के खिलाफ राजस्थान हाईकोर्ट में भी खिलाफ याचिका दाखिल की गई है। वहीं एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी इस विवादित कानून का विरोध किया है।

एडिटर्स गिल्ड ने इसे ‘पत्रकारों को परेशान करने, सरकारी अधिकारियों के काले कारनामे छिपाने और भारतीय संविधान की तरफ से सुनिश्चित प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाला एक घातक कानून’ बताया है।

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