आरक्षण के चक्रव्यूह में उलझी जातिया

aaaगुजरात सरकार ने राज्य के आर्थिक रूप से पिछड़े अगड़ों को दस फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया है। राज्य स्थापना दिवस यानी एक मई को इसे कानूनी रुप मिल गया। यह लाभ उन्हीं अगड़ी जातियों को मिलेेगा जिनकी सालाना आय 50 हजार रुपये मासिक या छह लाख वार्षिक है। इसका फायदा राज्य की ब्राह्मण, क्षत्रिय, पाटीदार और लोहाना समुदाय जैसी आर्थिक रूप से पिछड़ी अगड़ी जातियों को मिलेगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह की मौजूदगी में लिया गया यह निर्णय विशुद्ध तौर पर राजनीतिक है। भाजपा की ओर से राजनीतिक मंडी में इसके जरिए यह बताने की कोशिश की गयी है कि वह खांटी कबीर नीति ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर का अनुसरण किया है। इससे यह साफ होता है कि पार्टी की ओर से राजनीतिक मजबूरी में उठाया गया यह कदम है। उसकी इस घोषणा के पीछे कई कानूनी पेंच हैं। पाटीदार आंदोलन पर भाजपा और मोदी सरकार उलझ गयी थी। नगर निकाय चुनावों में भाजपा को बुरी पराजय का सामना करना पडा। वहां कांग्रेस नए अवतार में उभरी है, जिसका नतीजा है कि हार्दिक पटेल के आरक्षण आंदोलन को दबाने के लिए भाजपा ने आर्थिक रुप से पिछड़ी राज्य की अगड़ी जातियों को आरक्षण का लालीपाप देकर नया पैंतरा खेला है।
गुजरात सरकार की ओर से की गयी यह व्यवस्था खांटी राजनीतिक है। राज्य में सुप्रीमकोर्ट की ओर से तय आरक्षण की सीमा पहले ही पार हो चुकी है। एससी, ओबीसी, एसटी के लिए 50 फीसदी आरक्षण लागू है। जबकि अगड़ी जातियों को दिया गया 10 फीसदी आरक्षण उस सीमा से परे होगा। उस स्थिति में यह 60 फीसदी हो जाएगा। फिर कैसे बात बनेगी। सरकार ने समझदारी दिखाते हुए पिछड़ी, अनुसूचित और जनजातियों को छुआ तक नहीं है। अगर वह ऐसा करती तो राज्य में एक और आरक्षण की आग भड़क जाती, जिसका सीधा लाभ सेक्युलर ताकतों को पहुंचता। लालू यादव जैसे लोग आरएसएस प्रमुख भागवत के बयान की तरह मां के दूध की चुनौती पर उतर आते। मोदी के खिलाफ सारी ताकतें एक जुट हो जातीं। अभी राज्य की जो कांग्रेस यह कहती फिर रही है कि अगड़ों के लिए आरक्षण सीमा को 10 के बजाय 20 फीसदी किया जाए, वहीं उसके खिलाफ खड़ी होती। सरकार ने बेहद सूझबूझ से ऐसा दांव चला है कि जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। कुल मिलाकर इससे यह साफ हो चला है कि अगड़ों को आरक्षण पर सरकार अधिक संवेदनशील नहीं है। सवर्णों पर यह उसकी दोगली राजनीति है। उसे मालूम है कि गुजरात में पटेलों की राजनैतिक हैसियत को चुनौती नहीं दी जा सकती है। गुजरात में पटेलों की खासी हनक है। राज्य में 20 फीसदी लोग पटेल समुदाय के हैं, जिनकी राजनीति में अच्छी खासी हैसियत है। यह जाति किसी को सिंहासन दिला सकती है और सत्ता से पैदल भी कर सकती है। इसी चुनौती का नतीजा रहा कि नगर निकायों में पाटीदारों की नाराजगी से उसे भारी नुकसान उठना पड़ा है। 2017 में राज्य में आम चुनाव होने हैं। फिर सरकार क्यों इतना बड़ा जोखिम उठाएगी। गुजरात सरकार आरक्षण की इस राजनीति से यह संदेशा देना चाहती है कि वह अगड़ी जातियों की विरोधी न आरक्षणवाली जातियों की समर्थक। उसे मालूम है कि राज्य सरकार की ओर से लिया गया फैसला अदालती चुनौती का विषय बन सकता है। दूसरी तरफ ंआपको याद होगा जब पीएम मोदी ने नई दिल्ली में डा. भीमराव अंबेडकर की 125 वीं जयंती पर अंबेडकर स्मारक की आधारशिला रखते हुए दलितों और पिछड़ों को भरोसा दिलाने के लिए कहा था आरक्षण आप से कोई छीन नहीं सकता। विरोधियों की ओर से झूठ फैलाया जा रहा है। आरक्षण मेरे जीते जी नहीं खत्म होगा। बाबा साहब भी चले आएं तो आरक्षण खत्म नहीं हो सकता है। इस स्थिति में ओबीसी कोटे को भाजपा भला कैसे छू सकती थी। हमारे सामने कई उदाहरण है जिस पर सुप्रीमकोर्ट ने रोक लगा रखी है। कांग्रेस की सरकार में धर्म के आधार पर मुस्लिमों को दिए गए चार फीसदी आरक्षण पर अदालत विराम लगा चुकी है। जाटों को दिए गए आरक्षण पर भी प्रतिबंध लग चुका है। महाराष्ट्र सरकार के उस फैसले पर भी अदालत रोक लगा चुकी है जिसमें राज्य के मराठों को 16 फीसदी आरक्षण देने की वकालत की गयी थी। इसके पहले राजस्थान सरकार ने आर्थिक रुप से पिछड़ी अगड़ी जातियों को 14 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया था लेकिन अदालत ने उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया था। अभी हरियाणा की भाजपा सरकार ने जाट आरक्षण आंदोलन की आग कम करने के लिए आरक्षण देने का फैसला किया है। हार्दिक पटेल और पाटीदारों ने राज्य सरकार के इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया है। पटेल समुदाय खुद को ओबीसी में शामिल कर अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण की मांग कर रहा है। इस स्थिति में बात कहां से बनेगी। पाटीदार अमानत आंदोलन समिति ने इसे पटेलों को दिग्भ्रमित करने वाला फैसला बताया है। पाटीदार समिति ने इसके खिलाफ लालीपाप महोत्सव शुरु करने का एलान किया है। अब देखना होगा अदालत का अगला कदम क्या होगा। अगर अदालत इस पर मौन रहती है तो देश के दूसरे राज्यों की अगड़ी जातियों के लिए यह फैसला अहम होगा। गुजरात का यह प्रयोग देश की आरक्षण नीति का आधार बनना चाहिए। जातीयता के बजाय
सीधे शैक्षिक और आर्थिक आधार पर आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए। फिलहाल हमारे देश में यह संभव नहीं है। क्योंकि आधुनिक भारतीय राजनीति का आधार ही जाति है। आरक्षण का बम यहां वोट बैंक के रूप में काम करता है। आर्थिक आधार पर आरक्षण सेक्युलरवादियों के लिए अपच बम साबित होगा। उन्हें यह बर्दाश्त नहीं होगा क्योंकि उनकी राजनीति जाति आधारित है। जातियों को खुश करने के लिए आरक्षण का मसला उन्हें कायम रखना है। उन्हें सामाजिक समानता, समरसता और सामाजिक उन्नति से कोई ताल्लुक नहीं है। जबकि उत्तर प्रदेश में दलितों और पिछड़ों के मसीहा मायावती और मुलायम सिंह राज्य की अगड़ी जातियों को दस फीसदी आरक्षण देने का लालीपाप पहले दे चुके हैं। कांग्रेस के जनार्दन द्विवेदी और मनीश तिवारी भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत कर चुके हैं, लेकिन यह वादा केवल चुनावी होता है। जब लोग सत्ता में होते हैं तो कुछ नहीं करते हैं। कुल मिलाकर आरक्षण जातियों को राजनीतिक चक्रव्यूह में फंसाने का एक ब्रहमास्त्र है जिसका सदुपयोग राजनीतिक दल अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार करते आ रहे हैं। (हिफी)

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