योग, सत्य, धर्म तथा वेदों की वैज्ञानिकता का प्रचार-प्रसार होना चाहिए: बाबा रामदेव जी

जिस व्यक्ति का आहार-विहार ठीक नहीं है, जिस व्यक्ति की सांसारिक कार्यों के करने की निश्चित दिनचर्या नहीं है। उसे योग का कोई लाभ नहीं मिल सकता।ध्यान करते समय ध्यान को ही सर्वोपरि महत्व दें।

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 साधक को सदा विवेक, वैराग्य के भाव में रहना चाहिए। ब्रह्मचर्य के बिना तो स्वस्थ रहना भी कठिन है, फिर योगाभ्यासी को तो आहार, निंद्रा व ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन आवश्यक हो ही जाता है। यम एवं नियमों के पालन के बिना कोई भी व्यक्ति योगी नहीं हो सकता।

 योग एक पूर्ण विज्ञान है, एक पूर्ण जीवन शैली है, एक पूर्ण चिकित्सा पद्धति है एवं एक पूर्ण अध्यात्म विद्या है। योग सामान्य गृहस्थी के लिए भी अति आवश्यक है। विचारों की अपवित्रता ही हिंसा, अपराध, क्रूरता, शोषण, अन्याय, अधर्म और भ्रष्टाचार का कारण है।

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योग, सत्य, धर्म तथा वेदों की वैज्ञानिकता का प्रचार-प्रसार होना चाहिए तभी वेदों की संस्कृति विश्व की संस्कृति बन पाएगी। आज गुरूकुल शिक्षा प्रणाली के प्रचार-प्रसार की अति आवश्यकता है इसी शिक्षा पद्धति से ही मानव का सही अर्थों में सर्वागीण विकास होता है। प्राचीन काल में इसी पद्धति से पढाई होती थी। यहाँ से पढकर निकलने वाले ब्रह्मचारी का सब जगह मान-सम्मान होता था।

जीवन ईश्वर की सबसे बड़ी सौगात है। मनुष्य का जन्म हमारे लिए ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है।

मनुष्य का जन्म ही दर्द और पीड़ा के साथ होता है। अतः जीवन भर जीवन में कांटे ही रहेंगे। उन काँटों के बीच तुम्हें गुलाब के फूलों की तरह अपने जीवन पुष्प को विकसित करना है।

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ईश्वर सदैव हमें हमारी क्षमता, पात्रता और श्रम से अधिक ही प्रदान करते हैं.सद्विचार ही सद्व्यवहार का मूल है। सबसे पहले मैं माँ भारती का पुत्र हूँ, बाद में संन्यासी, गृहस्थ, नेता, अभिनेता, अधिकारी या व्यापारी हूँ।

 

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