‘हिन्दू’ और हिन्दूकुश पर्वत का ऐसा संबंध जो खोलेगा इतिहास का रहस्य!

हिन्दू और हिन्दुस्तान को लेकर कई तरह के मिथ हैं। मिथ इसलिए क्योंकि इनकी सच्चाई को लेकर कई मत हैं। अपूर्ण सत्य को मिथ कहते हैं। लिहाजा भारत और भारतीयता को लेकर जो बातें की गईं हैं। उनके पीछे के सच को जानने के लिए हमें उन कहानियों पर गौर करना होगा जो वेदों में पुराणों में कही गईं हैं। उस भौगोलिकता को समझना होगा जिससे हिन्दुओं को कनेक्शन हैं।

इतिहास में लिखा है कि वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की थी तो क्या उससे पहले किसी को पता ही नहीं था कि भारत है? नहीं… ऐसा नहीं है।

हिन्दूकुश पर्वत

सबसे पहले हिन्दूकुश पर्वत का हिन्दुओं से क्या कनेक्शन हैं? ये समझना जरूरी है क्योंकि हिन्दु धर्म के इतिहास की जब बात की जाती है तो इस पर्वतश्रंखला कि बात होती है। तो पहले तो आप ये समझ लीजिए क्या है हिन्दूकुश।

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं

वर्षं तद भारतं नाम भारती यत्र संततिः

अर्थात

पृथ्वी का वह भूभाग जो समुद्र के उत्तर में और हिमालय के दक्षिण में है। महान भारत कहलाता है और उसकी संतानों को भारतीय कहते हैं।

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हिन्दूकुश पर्वतमाला क्या है ?

पाकिस्तान से मध्य अफगानिस्तान तक 800 किमी लंबी पर्वत श्रृंखला है। पामीर पर्वतों से जुड़ती है और हिमालय की एक उपशाखा मानी जाती है। पामीर का पठार, तिब्बत का पठार और मालवा का पठार रहने लायक स्थान हैं।

मान्यता है कि प्रारंभिक मनुष्य इसी पठारों में रहकर अपना जीवन जीते थे। हिन्दूकुश पर्वतमाला का सबसे ऊंचा पहाड़ खैबर-पख्तूनख्वा के चित्राल में है। हिन्दूकुश का दूसरा सबसे ऊंचा पहाड़ नोशक पर्वत और तीसरा इस्तोर-ओ-नल है।

हिन्दूकुश और काराकोरम पर्वतमाला के बीच में एक हिन्दू राज पर्वत श्रृंखला है। इसके उसपार कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, चीन, रूस, मंगोलिया हैं।

 हिन्दूकुश पर्वत का पहले नाम पारियात्र पर्वत था। कुछ विद्वान इसे परिजात पर्वत तो कुछ हिन्दू केश कहते हैं। केश का अर्थ अंतिम सिरा। इसे हिन्दू केश इसलिए कहते थे कि यहां भारत की सीमा का अंत होता है। केश का अर्थ होता है अंत। यहां तक भारत में रहने वाले हिन्दुओं का क्षेत्र था। यानी हिन्दुओं के क्षेत्र की सीमा का अग्रभाग इस रामायण से भी कनेक्शन है।

हिन्दुकुश का रामायण कनेक्शन

यहां भगवान राम के एक बड़े बेटे कुश ने तपस्या ‍की थी। तपस्या के बाद कुश ने यहां अमृत दीक्षा ग्रहण की थी। कुश का आसपास के संपूर्ण क्षेत्र पर अपना अधिकार था। यहां रहने वाली कई जातियों के नाम कुश के ऊपर हैं। लव और कुश राम और सीता के जुड़वां पुत्र थे जो वन में रहे।

हिन्दूकुश से विदेशियों का आक्रमण मौर्योत्तर काल में सबसे ज्यादा हुआ था। इस इलाके पर सबसे पहले यूनानियों ने आक्रमण किया। फिर सिकंदर ने जब इसे अपने कब्जे में ले लिया तो इसका नाम यूनानी भाषा में ‘कौकासोश इन्दिकौश’ यानी ‘भारतीय पर्वत’ पड़ गया।

बाद में इनका नाम ‘हिन्दूकुश’, ‘हिन्दू कुह’ और ‘कुह-ए-हिन्दू’ पड़ा। ‘कुह’ या ‘कोह’ का मतलब फारसी में ‘पहाड़’ होता है।

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 आक्रांताओं के आक्रमण का इतिहास

आक्रांताओं में सबसे पहले ‘बैक्ट्रिन ग्रीक’ यानी ‘यवन’ शासकों ने हमला किया। हिन्दुकुश पर्वत और ‘ऑक्सस’ के बीच में बैक्ट्रिया’ अत्यन्त ही उपजाऊ प्रदेश था।

इस इलाके के उपजाऊपन के कारण ही ‘स्ट्रैबो’ ने इसे ‘अरियाना गौरव’ कहा था। बैक्ट्रिया में यूनानी बस्तियों की शूरूआत ‘एकेमेनिड काल’ 5 ईसा पूर्व में हुई। सिकन्दर की मौत के बाद बैक्ट्रिया पर सेल्युकस का अधिपत्य हो गया था।

सेल्यूकस वंश के ‘आन्तियोकस तृतीय’ ने ‘यूथीडेमस’ को बैक्ट्रिया का राजा माना। ‘यूथीडेमस’ ने 206 ईसा पूर्व में भारत के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया। अभियान में ‘भारतीयों का राजा’ सुभगसेन को हराने की रणनीति पर काम हुआ। डेमेट्रियस और मीनेंडर नामक यवन शासकों ने भी हिन्दूकुश पर हमला किया।

पार्थियन, शक, कुषाण और हूण ने अफगानिस्तान (आर्यना) पर हमले किए। अरब और तुर्की के खलीफाओं ने हिन्दूकुश के रास्ते से भारत पर हमले किए। सिकन्दर के बाद डेमेट्रियस पहला यूनानी था जो भारतीय सीमा में दाखिल हुआ। डेमेट्रियस ने183 ईपू में हिन्दुकुश को पारकर सिंध और पंजाब पर अधिकार किया।

1333 ईस्वी इब्नबतूता ने हिन्दुकुश को ‘मारने वाला’ पर्वत करार दिया था। भारत पर अरबों-तुर्कों के कब्जे के लिए हिन्दूकुश का रास्ता अहम था। मुगलों ने अफगानिस्तान को हिन्दूविहीन बनाने के लिए कत्लेआम किया। हिन्दूकुश पर आक्रांताओं ने लाखों हिन्दुओं को गुलाम बनाकर मरने के लिए भेजा।

अरब, बगदाद, समरकंद जैसे इलाकों में हिन्दुओं को बेचने के लिए मंडियां लगाईं। आक्रांताओं की यातनाओं से वही हिन्दु बचे जिन्होंने इस्लाम धर्म अपनाया था। तैमूर लंग ने 1 लाख गुलामों को हिन्दूकुश की बर्फीली चोटियों पर छोड़ दिया था।

हिन्दूकुश पर्वत श्रंखला बेहद हिन्दुओं की पहचान से जुड़ी रही है। इसके सहारे ही तमाम आक्रांताओं ने हिन्दुओं के नाश की साजिश रची। यानी हिन्दुओं के इतिहास के बारे में अगर गहराई से देखें तो आक्रांताओं के पहले जो परंपराएं हिन्दुकुश के इस पार थीं वो हिन्दू थीं और आक्रांताओं ने यहां पर हिन्दू को खत्म करने के लिए काम किया।

हिन्दू धर्म कितना पुराना है अगर हमें इसकों समझना है तो हमें ये भी समझना होगा कि पूरी दुनिया में इस धर्म के होने के निशान कहां कहां पर मिलते हैं। मान्यताएं कई हैं और इतिहासकारों ने अपने-अपने हिसाब और प्रमाणों के माध्यम से हिन्दु धर्म के बारे में जानकारी दी है लेकिन बड़ी बात ये है कि दुनिया के तमाम मुल्कों में पुरातत्ववेत्ताओं को हिन्दुओं के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली है। जैसे-

 हड़प्पा और मोहनजोदोड़ो सभ्यता (5000-3500 ईसा पूर्व)

सिन्धु नदी आसपास फैली सभ्यता को ही सिन्धु घाटी की सभ्यता कहते हैं। नदी के किनारों पर हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में खुदाई में इस प्रमाण मिले। सबसे प्राचीन और पूरी तरह विकसित नगर और सभ्यता के अवशेष मिले। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में खुदाई से असंख्य देवियों की मूर्तियां मिलीं थीं।

चार्ल्स मेसन ने साल 1842 में पहली बार हड़प्पा सभ्यता को खोजा था। 1921 में दया राम साहनी ने हड़प्पा की आधिकारिक खोज की थी। हड़प्पा की खुदाई में मिली चीजों से इसे हिन्दु धर्म से जोड़ा जा सकता है। खुदाई में मूर्ति, बैल, नंदी, मातृदेवी, बैलगाड़ी और शिवलिंग जैसी चीजें मिली। 1940 में हुई खुदाई से पुरातात्विक विभाग को 5000 पुराना शिवलिंग मिला।

 बाली का प्राचीन मंदिर

इंडोनेशिया हिन्दू राष्ट्र था लेकिन इस्लामिक उत्थान ने इसे मुस्लिम राष्ट्र बनाया। इंडोनेशियन इस्लामिक यूनिवर्सिटी की जगह पर कभी हिन्दू मंदिर हुआ करता था। इंडोनेशिया का बाली द्वीप हिन्दू बहुल इलाका है यहां आज भी हिन्दु संस्कृति है। बाली में एक इमारत के निर्माण की खुदाई के दौरान मंदिर के कुछ अंश मिले थे।

बाली हिन्दू धर्म का केंद्र था यहां एक विशालकाय मंदिर हिन्दुओं की पहचान है। यहां हिन्दुओं के कई प्राचीन मंदिरों के अलावा एक गुफा मंदिर भी मशहूर है। बाली के गुफा मंदिर को 19 अक्टूबर 1995 को विश्व धरोहरों में शामिल किया गया। गुफा मंदिर में 3 शिवलिंग बने हैं जिसे देश-विदेश से पर्यटक देखने आते हैं।

इंडोनेशिया के गुफा मंदिर रामयण से कनेक्शन है। मान्यता ये है कि शंकर पुत्र सुकेश के तीन पुत्र थे- माली, सुमाली और माल्यवान। इन तीनों ने सुमेरु पर्वत पर लंकापुरी बसाई थी लेकिन माली का वध करके देवों और यक्षों ने कुबेर को लंकापति बना दिया। कुबेर रावण की सौतेली माता इलविल्ला के पुत्र थे। रावण की असली मां कैकसी जो सुमाली की पुत्री थी उन्होंने रावण को कुबेर से युद्ध के लिए उकसाया लेकिन रावण के पिता ने युद्ध से पहले ही कुबेर को कैलाश पर्वत के आसपास के त्रिविष्टप जिसे आज तिब्बत कहते हैं वहां भेज दिया।

रावण ने लंका को कब्जा लिया कहते हैं उस वक्त रावण का राज्य विस्तार, इंडोनेशिया, मलेशिया, बर्मा, दक्षिण भारत के कुछ राज्य और संपूर्ण श्रीलंका पर पर था।

तो एक कहानी ये भी है लिहाजा इंडोनेशिया में भी हिन्दुओं के होने के प्रमाण हैं। मानने वाले तो ये भी मानते हैं कि वेटिकन सिटी से भी हिन्दुओं का कनेक्शन हैं। कैसे आईये जानते हैं-

वेटिकन शहर का हिन्दुओं से कनेक्शन

इस शहर में पुरातात्विक खुदाई के दौरान शिवलिंग प्राप्त हुआ है। ये शिवलिंग रोम के ग्रेगोरियन इट्रस्केन संग्रहालय में रखा गया है। इतिहासकार पी।एन।ओक ने अपने शोध में अहम दावा किया है कि ‘धर्म चाहे कोई भी हो उसका उद्भव हिन्दू धर्म में से ही हुआ है’। पी।एन।ओक का कहना है कि वेटिकन शब्द की उत्पत्ति हिन्दी के ‘वाटिका’ शब्द से हुई।

कंबोडिया का हिन्दू सम्राज्य

सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर और धार्मिक स्मारक कंबोडिया में स्थित है। कंबोडिया के अंकोर में ये स्मारक है जिसका पुराना नाम ‘यशोधरपुर’ था। स्मारकों और मंदिरों का निर्माण सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय (1112-53ई।) में कराया। सम्राट सूर्यवर्मन द्वितीय ने विष्णु मन्दिर और उनसे पहले शिवमंदिर बनवाया गए। कंबोडिया में बड़ी संख्या में हिन्दू और बौद्ध मंदिर हैं और ये हिन्दू धर्म के निशान हैं।

पौराणिक काल का कंबोजदेश कल का कंपूचिया और आज का कंबोडिया है। कंबोडिया में पहले हिंदू और फिर बौद्ध धर्म के प्रमाण मिलते हैं। कंबोडिया का अंगकोर वाट मंदिर दुनिया में सबसे बड़ा विष्णु मंदिर है। विश्व धरोहर अंगकोर वाट राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने 12वीं सदी में बनवाया। 1986 से 93 तक ASI ने यहाँ संरक्षण का काम किया था। अंगकोर वाट की दीवारें रामायण और महाभारत की कहानियाँ कहती हैं।

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 अफ्रीका में हिन्दू

साउथ अफ्रीका के सुद्वारा नामक एक गुफा से 6000 साल पुराना शिवलिंग मिला। शिवलिंग को कठोर ग्रेनाइट पत्थर से बनाया गया, पुरातत्ववेत्ता इसे देखकर हैराना थे। दुनिया की सबसे ऊंची शिवशक्ति की प्रतिमा का अनावरण दक्षिण अफ्रीका में किया गया। शिव और पार्वती की ये प्रतिमा बेनोनी शहर के एकटोनविले में स्थापित की गई। 20 मीटर ऊंची प्रतिमा को बनाने में 90 टन के करीब स्टील का इस्तेमाल हुआ है।

 चीन में हिन्दू

चीनी इतिहासकारों मानते हैं कि च्वानजो शहर के इर्द गिर्द हिन्दुओं का तीर्थस्थल था। च्वानजो इलाके में 1,000 साल पहले बने हिन्दू मंदिरों के खंडहर पाए गए थे। 1,000 वर्ष पहले सुंग राजवंश के दौरान दक्षिण चीन के फुच्यान प्रांत में मंदिर थे।

रूस में हिन्दू

1000 साल पहले रूस में असंगठित रूप से हिन्दू धर्म प्रचलित था। 10वीं शताब्दी में रूसी राजा व्लादीमिर ने कियेव रियासत को ईसाई बनाया। प्राचीनकाल में रूस के मध्यभाग को जम्बूद्वीप का इलावर्त कहा जाता था। वोल्गा प्रांत के स्ताराया मायना गांव में 7वीं सदी की विष्णु की मूर्ति मिली थी। 2007 में सालों की खुदाई के बाद पुरातत्ववेत्ताओं ने ये प्रतिमा खोजी थी।

स्ताराया मायना 1700 साल पहले एक रूस का प्राचीन और विशाल शहर था। महाभारत में उत्तर-कुरु का मतलब रूस और उत्तरी ध्रुव से जोड़ा गया है। खुदाई करने पर डॉ। कोजविनका को हिन्दू धर्म से जुड़ी कई चीजें मिली थीं। डॉ। रामविलास शर्मा के मुताबिक रूसी भाषा में 2,000 शब्द संस्कृत मूल के हैं।

चिली और पेरू में हिन्दू धर्म

यहां हिन्दुओं ने प्राचीनकाल में अपनी बस्तियां बनाईं और कृषि का भी विकास किया। यहां के प्राचीन मंदिरों के द्वार पर विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार, नाग का जिक्र है।

वियतनाम में हिन्दू धर्म

वियतनाम का इतिहास 2,700 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। वियतनाम का पुराना नाम चम्पा था यहां के राजा शैव थे। दूसरी शताब्दी में स्थापित चंपा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां के चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता ग्रहण की थी। 1825 में चंपा के महान हिन्दू राज्य का अंत हुआ। श्री भद्रवर्मन् चीन में जिन्हें फन-हु-ता (380-413 ई।) में यहां हुए। श्री भद्रवर्मन् चंपा के प्रसिद्ध सम्राटों थे उन्होंने कई सांस्कृतिक कार्य किए। चंपा संस्कृति के अवशेष वियतनाम में मिलते हैं जिनमें कई शैव मन्दिर हैं। शुरू में चम्पा के लोग और राजा शैव थे लेकिन फिर यहां इस्लाम फैला।

वानर साम्राज्य और अमेरिका का कनेक्शन

शोधकर्ता चार्ल्स लिन्द्बेर्ग ने अमेरिका में वानर साम्राज्य की खोज की। सेंट्रल अमेरिका के मोस्कुइटीए खोजी जगह को ला स्यूदाद ब्लैंका नाम दिया गया। ला स्यूदाद ब्लैंका के स्थानीय लोग बंदरों की मूर्तियों की पूजा करते हैं। चार्ल्स के मुताबिक ला स्यूदाद ब्लैंका पर हनुमान का साम्राज्य होता था। अमेरिकन इतिहासकार मानते हैं‍ कि आर्यों ने अमेरिका में सबसे पहले बस्तियां बनाई।

दुनिया में एक और समुदाय है कहा जाता है कि वो भी कभी हिन्दू थे लेकिन इस्लामिक आतंकवाद के चलते यजीदी अब खत्म हो रहे हैं। शोधकर्ताओं के प्रमाणों को देखें तो यजीदियों की गणना कहती है कि यह परंपरा 6,763 साल पुरानी है। यानी ईसा के 4,748 साल पहले यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों से पहले से यह परंपरा चली आ रही है।

यजीदी का हिन्दू कनेक्शन

यजीदियों का यजीद या ईरानी शहर यज्द से कोई लेना-देना नहीं है। इनका संबंध फारसी भाषा के ‘इजीद’ से है जिसके मतलब फरिश्ता है। इजीदिस माने ‘देवता के उपासक’ और यजीदी भी खुद को यही कहते हैं। यजीदियों की कई मान्यताएं हिन्दू और ईसाईयों से मिलती-जुलती हैं। ‘यजीदी’ का अर्थ ‘ईश्वर के पूजक’ होता है, ईश्वर को ‘यजदान’ कहते हैं। यजीदी मानते हैं कि ‘यजदान’ से 7 महान आत्माएं निकलती हैं। हिन्दुओं की तरह ही यजीदियों में जल और जलाभिषेक का महत्व है। यजीदी तिलक लगाते हैं, दीपक जलाते हैं, इनके देवता कार्तिकेय जैसे हैं। यजीदी पुनर्जन्म को मानते हैं और अपने ईश्‍वर की 5 वक्त प्रार्थना करते। यजीदी पृथ्वी, जल और अग्नि में थूकने को पाप समझते हैं।

इन तमाम प्रमाणों को माने तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि सभी धर्मों का मूल हिन्दू ही हैं। दुनिया ये बात मानने को तैयार नहीं होती और अपने अपने तरीकों से हिन्दुओं के इतिहास को प्रदर्शित किया जाता है। इतिहास में दो बातें प्रचारित की जाती है।

पहली यह की भारतीय इतिहास की शुरुआत सिंधु घाटी की सभ्यता से होती है और दूसरी ये कि सिंधु घाटी के लोग द्रविड़ थे यानी वो आर्य नहीं थे लेकिन इसमें भी विरोधाभास है। क्योंकि कुछ लोग इतिहासकार इससे इत्तेफाक नहीं रखते। कुछ इतिहासकार इसे सिकंदर के भारत आगमन से जोड़कर देखते हैं।

कितनी पुरानी है सभ्यताएं ?

प्राचीन भारत के इतिहास की शुरुआत करीब 13 हजार ईसापूर्व हुई। मेहरगढ़ सभ्यता लगभग 7000 से 3300 ईसा पूर्व अस्तित्व में थी। सिंधु घाटी सभ्यता 3300 से 1700 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी। सिंधु-सरस्वती सभ्यता लगभग 9,000 ईसा पूर्व अस्तित्व में आई थी।

3000 ईसापूर्व में सिंधु-सरस्वती सभ्यता अपना स्वर्ण युग देखा था। 1800 ईसा पूर्व के आसपास भयानक आपदा ने सरस्वती नदी लुप्त कर दिया। पुरात्ववेत्ता मेसोपोटामिया (5000- 300 ईसापूर्व) को सबसे प्राचीन बताते हैं।

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