
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को ग्रेटर नोएडा के एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट को कड़ी फटकार लगाई है। मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के एक छात्र को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने के कारण 5 लाख रुपये का कारण बताओ नोटिस जारी करने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने हैरानी जताई कि जब अदालत पहले ही छात्रों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई न करने का आदेश दे चुकी थी, तो मजिस्ट्रेट ने यह नोटिस कैसे जारी कर दिया।
“मजिस्ट्रेट की हिम्मत कैसे हुई?”
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाया। सीजेआई ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “एक मजिस्ट्रेट की नोटिस जारी करने की हिम्मत कैसे हुई? हमने स्पष्ट किया था कि किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी। कोई भी मजिस्ट्रेट हमारे उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।” उन्होंने आगे कहा कि हमारे युवाओं के खिलाफ कार्रवाई का कोई सवाल ही नहीं उठता।
क्या था नोटिस में?
वरिष्ठ अधिवक्ता बिस्वजीत भट्टाचार्य ने मौखिक उल्लेख (Oral Mentioning) के जरिए अदालत को बताया कि ग्रेटर नोएडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट-III ने 4 सितंबर को पुलिस रिपोर्ट के आधार पर गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के द्वितीय वर्ष के छात्र अक्षत त्रिपाठी को नोटिस जारी किया था।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत जारी इस नोटिस में छात्र पर आरोप लगाया गया था कि वह विश्वविद्यालय में “सरकार विरोधी भ्रामक बातें” फैलाकर छात्रों को CJP के प्रदर्शन में शामिल होने के लिए भड़का रहा था, जिससे शांति भंग होने का खतरा था। नोटिस में छात्र से 5 लाख रुपये का निजी मुचलका (Personal Bond) और 5-5 लाख रुपये के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया था। हालांकि, बाद में इस नोटिस को वापस ले लिया गया था।
वकील की दलील: ‘छात्रों के साथ प्रयोग कर रहा प्रशासन’
अधिवक्ता भट्टाचार्य ने प्रशासन की इस कार्रवाई को “भारत के छात्रों के साथ एक प्रयोग” करार दिया। उन्होंने तर्क दिया कि नोएडा और यूपी के अधिकारी छात्रों के बीच “डर का माहौल” (Fear Psychosis) पैदा नहीं कर सकते। जस्टिस जॉयमाल्या बागची के इस सवाल पर कि जब नोटिस वापस ले लिया गया है, तो क्या मामला बचता है, वकील ने दलील दी कि सिर्फ नोटिस वापस लेने से सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना खत्म नहीं हो जाती। छात्र अक्षत त्रिपाठी ने भी पुलिस के सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसने शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी से मांगा जाएगा स्पष्टीकरण
पीठ (जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थीं) ने वकील को निर्देश दिया है कि वे सभी तथ्य और नोटिस अदालत के रिकॉर्ड पर रखें। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि वह इस मामले की जांच करेगा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से इस पर स्पष्टीकरण मांगेगा।
क्या था CJP प्रदर्शन का पूरा मामला?
नीट (NEET) परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर 20 जून को CJP का 36 दिवसीय विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ था, जो तत्कालीन शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और मांगें माने जाने के बाद समाप्त हुआ था। 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें भी हुई थीं। इसके बाद 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए CJP के प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ दर्ज सभी एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया था।




