सरकार पर भारी पड़े आलोक वर्मा, कोर्ट ने निरस्त किया फैसला

नई दिल्ली। कोर्ट के इस फैसले के बाद आलोक वर्मा की सीबीआई में एक बार फिर से वापसी होना तय माना जा रहा है। आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने का फैसला निरस्त करते हुए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है।

हालांकि कोर्ट के आदेश के बाद भी आलोक वर्मा कोई नीतिगत फैसला नहीं ले पाएंगे। कोर्ट ने इस बात का जिक्र भी अपने फैसले में किया। आलोक वर्मा के पक्ष में फैसला आने से कोर्ट द्वारा सरकार को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट के फैसले के बाद आलोक वर्मा ने मांग की है कि उनका कार्यकाल 75 दिनों तक बढ़ाया जाए क्योंकि वह 75 दिनों तक छुट्टी पर रहे।

इससे पहले सीबीआई में आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना के बीच मचे घमासान के चलते सरकार द्वारा इन दोनों ही अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित करते हुए छुट्टी पर भेज दिया गया था। वर्मा ने सरकार के इस फैसले के खिलाफ कोर्ट का रुख किया था। जहां अब 75 दिनों बाद कोर्ट ने वर्मा के पक्ष में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सरकार का फैसला पलटते हुए उन्हें सरकार द्वारा छुट्टी पर भेजने का फैसला निरस्त करते हुए वर्मा की सीबीआई में वापसी करा दी है। कोर्ट के इस फैसले को सीबीआई के झगड़े में वर्मा की जीत के तौर पर देखा जा रहा है।

इससे पहले इस मसले पर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट के सामने वर्मा को उनकी जिम्मेदारियों से हटाकर अवकाश पर भेजने के अपने फैसले को सही ठहराया था और कहा था कि उनके और अस्थाना के बीच टकराव की स्थिति है जिस वजह से देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी जनता की नजरों में हंसी का पात्र बन रही है। अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने बेंच से कहा था केंद्र के पास हस्तक्षेप करने और दोनों अधिकारियों से शक्तियां लेकर उन्हें छुट्टी पर भेजने का अधिकार है।

वहीं वर्मा का सीबीआई निदेशक के रूप में दो साल का कार्यकाल 31 जनवरी को पूरा हो रहा है। ऐसे में उन्होंने केंद्र के फैसले को चुनौती देने हुए शीर्ष अदालत का रुख किया था।

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वर्मा ने केन्द्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) के एक और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सोनल एंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) के दो सहित 23 अक्टूबर, 2018 के कुल तीन आदेशों को निरस्त करने की मांग की है। उनका आरोप है कि ये आदेश क्षेत्राधिकार के बिना और संविधान के अनुच्छेदों 14, 19 और 21 का उल्लंघन करके जारी किए गये।

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चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति केएम जोसेफ की बेंच ने पिछले साल छह दिसंबर को आलोक वर्मा की याचिका पर वर्मा, केंद्र, सीवीसी और अन्य की दलीलों पर सुनवाई पूरी करते हुए फैसला सुरक्षित रखा था।

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