भारत का यह स्थान ब्रह्मकुंड से भी पुराना, जहां पर छलका था समुद्र मंथन का अमृत

हर की पैड़ी पर बना ब्रह्मकुंड करीब दस लाख वर्ष पूर्व त्रेता युग में राम के पुरखे राजा भगीरथ द्वारा लाई गई गंगा से भी पुराना तीर्थ है।

छलका

भागीरथी गंगा ब्रह्मकुंड से होते हुए ही गंगा सागर की ओर बढ़ी। इसी ब्रह्मकुंड में समुद्र मंथन के दौरान निकला अमृत छलका था। यही वह स्थल है जहां त्रेता युग से असंख्य यात्री गंगा स्नान, कुंभ स्नान और अस्थि प्रवाह के लिए आते रहे हैं।

ब्रह्मकुंभ वह स्थल है, जहां इलावृत्त के राजा श्वेत ने दस हजार वर्षों तक ब्रह्मा के लिए तपस्या की थी। प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने दर्शन दिए और राज की इच्छा अनुसार अपने नाम से ब्रह्मकुंड की स्थापना की। श्वेत की प्रार्थना पर ब्रह्मा के साथ शिव और विष्णु भी यहां आकर विराजे। सृष्टि नियंता ब्रह्मा ने वरदान दिया कि देश के सभी तीर्थ इस ब्रह्मकुंड में निवास करेंगे।

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जब ब्रह्मकुंड तीर्थ बना तब तक गंगा का आगमन इस धर्मनगरी में नहीं हुआ था। कालांतर में भगवान राम की चार पीढ़ी पूर्व के पुरखे भगीरथ जब गंगा लाए, तब गंगा इसी ब्रह्मकुंड से होते हुए बही। उज्जयिनी के राजा भर्तृहरि ने इसी ब्रह्मकुंड के किनारे पर्वत पर तप किया।

भर्तृहरि के भाई विख्यात राजा विक्रमादित्य ने भाई के लिए पर्वत से ब्रह्मकुंड के तट तक पैड़ियां बनवाई जो पहले भर्तृहरि की पैड़ियां और बाद में हरि और हर की पैड़ी के रूप में विख्यात हुईं।

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देवों और दानवों के बीच हुए समुद्र मंथन से निकला अमृत लेकर जब जयंत हरिद्वार पहुंचे तब उनके कलश से अमृत इसी ब्रह्मकुंड पर छलका था। तभी से अपने पुरखों की अमरता के लिए अस्थि प्रवाह और मोक्ष के लिए गंगा स्नान ब्रह्मकुंड में प्रारंभ हुआ। त्रेता युग से ही कर्मकांड करने और वंशावलि संरक्षण के लिए तीर्थ पुरोहित यहां विद्यमान हैं।

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