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इस शख्स ने की थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत, जानने के लिए अभी पढ़ें ये खबर….

सावन का महीना चल रहा है। भक्त भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए और उनकी कृपा पाने के लिए हर तरह से प्रयास कर रहे हैं। सावन का यह महीना शिव भक्तों के लिए खास है क्योंकि सावन का महीना महादेव का प्रिय महीना होता है।

इस दौरान लोग व्रत, उपवास व सात्विक भोजन ग्रहण कर शिव जी की आराधना करते हैं।

इस शख्स ने की थी कांवड़ यात्रा की शुरुआत,

जैसा कि आप जानते ही हैं कि सावन के महीने में लाखों की संख्या में भक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं। सड़कों पर, गलियों में, मंदिरों में हर जगह आपको इस वक्त कांवरियों की भीड़ देखने को मिलेगी, लेकिन क्या आपको पता है कि सबसे पहले कांवड़ यात्रा किसने और कहां से निकाली थी?

आज हम आपको इस बारे में पूरी बात बताएंगे कि आखिर पहला कांवड़िया कौन था?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सबसे पहले कांवड़िया प्रभू श्री राम थे। उन्होंने सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। एक दूसरी मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के परमभक्त परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ उठाई थी।

इसी वजह से उन्हें पहला कांवड़ भी माना जाता है।

कहीं-कहीं लोगों का ऐसा मानना हैं कि, कांवड की परंपरा की शुरुआत श्रवण कुमार ने की थी। उनके माता-पिता की हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा थी। अपने दृष्टिहीन माता-पिता की इस इच्छा को पूरा करने के लिए श्रवण कुमार ने उन्हें कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार गंगा स्नान कराने लाए थे।

माना जाता है तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।

पुराणों में एक और मान्यता का वर्णन है जिसके अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी। जी हां, ऐसा वर्णित है कि, समुद्रमंथन में विष पान के बाद भगवान शिव का गला नीला हो गया था।

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विष के प्रभाव से उनके शरीर की हालत काफी बुरी हो गई थी जिसे देखकर सभी देवता चिंतित हो उठे।

विष के इस प्रभाव को कम करने के लिए देवताओं ने शिव के शरीर पर गंगा जंल चढ़ाया।

पवित्र और शीतलता से भरपूर गंगा जल से जलाभिषेक करने से महादेव का शरीर धीरे-धीरे सामान्य होने लगा। तब से आज तक इसी वजह से परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांवड़िये हरिद्वार से गंगा जल लेकर नीलकंठ महादेव में चढ़ाते हैं।

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