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सरकार के इस आदेश से अधिकारियों को लगा झटका

लखनऊ। कहते हैं किसी का असर कम होने में समय लगता है या फिर यूं कहें कि सत्ता का नशा चढ़ने में और उसे दूसरों पर उतारने में समय नहीं लगता। यूपी में वनवास खत्म कर घर वापसी करने वाली भारतीय जनता पार्टी की कमान संभालने वाले योगी आदित्यनाथ के साथ और उनकी सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। तभी तो भगवा सरकार आते ही बीते मई महीने में गोरखपुर के विधायक राधामोहन अग्रवाल ने सरेआम महिला पुलिस अधिकारी को हड़का दिया। पुलिस अधिकारी चारू निगम की आंखों से आंसू बाहर आ गए। मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। शायद ये असर बीती ‘दबंग’ समाजवादी सरकार का असर हो, जिसके हटते ही योगी आदित्यनाथ बैठ गए।

योगी आदित्यनाथ

शायद योगी सरकार भी अखिलेश सरकार के नक्शे कदम पर चल रही है। तभी तो सरकार में सिर्फ माननीयों की कद्र की जा रही है, न कि अधिकारियों की। सपा सरकार में भी अधिकारियों की फजीहत करने का मौका नहीं छोड़ा जाता था। तत्कालीन एसपी मुखिया मुलायम सिंह यादव द्वारा एक सीनियर आईपीएस अधिकारी को धमकाए जाने का ऑडियो वायरल हुआ था।

यूपी में आजम खान की भैंस ढूंढने का मामला तो लोगों के जेहन से हट ही नहीं सकता। इसके अलावा सिर्फ हफ्तेभर हुए होंगे जब दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की कार सिर्फ दो दिनों के भीतर बरामद हो गई, जबकि आम आदमी तो टायर की तरह घिस जाता है।

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यहां ये घटनाएं बताने का कारण मात्र इतना था कि राजनेता किस तरह नौकरशाह को एक ‘अर्दली’ के रूप में बदल सकते हैं या बदलते देखना चाहते हैं। अधिकारियों और नेताओं के बीच का कैसा संबंध होता है ये तो शासन-प्रशासन से लेकर आम जनता तक देख ही चुकी है। शायद यूपी में नेताओं आदत में पूरी तरह से ढ़लने की कोशिश में सीएम योगी भी लगे हुए हैं, तभी तो एक ऐसा फरमान लाए हैं जिसमें अधिकारी माननीय से… जी सर, यस सर कहते नहीं थकेंगे और कहना पड़ेगा। कुछ ऐसा ही है सरकार का नया आदेश।

यूपी सरकार का नया निर्देश आया है। इसके तहत अगर कोई जनप्रतिनिधि अगर किसी अधिकारी से मिलने जाता है तो वह उसके दाखिल होने पर खड़ा हो और जाने पर भी। इसका कारण भी बताया गया है। वो ये है कि अधिकारी जनप्रितिनिधियों का सम्मान करें। इस फरमान के बाद अधिकारी जरूरू काम छोड़ सर, सर ही कहेगा। क्योंकि किसी भी जिले में डीएम एक होता है और एसपी भी। पर जनप्रितिनिधि तो थोक के भाव जिले में होते हैं। जनप्रतिनिधि सामान्य तौर पर अपने इलाके की कई छोटी-मोटी समस्याओं के लिए अधिकारियों को फोन करते हैं।

भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देश की ब्यूरोक्रेसी को ‘स्टील फ्रेम’ करार दिया था। उनका मानना था कि देश के उत्तरोत्तर विकास में अराजनीतिक ब्यूरोक्रेसी का बहुत बड़ा योगदान है। अराजनीतिक इसलिए क्योंकि अगर ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण होता जाएगा तो वो स्टील फ्रेम लचीला होता जाएगा। जिसके भरोसे ये उम्मीद की जा रही थी कि देश में अहम रोल अदा करेगा।

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हमारे सामने पहले से ब्यूरोक्रेसी के कोई बहुत अच्छे उदाहरण मौजूद नहीं हैं। सरदार पटेल के समय से लेकर अभी तक हमारे समाज में कई बड़े बदलाव आ चुके हैं। अब अधिकारियों के सामने नेताओं के कई तरह के प्रेशर ग्रुप भी होते हैं। इसके अलावा आर्थिकी का महत्व सबसे ज्यादा हो जाने के कारण अब समाज के हाशिये पर पड़े लोगों का भी अधिकारियों को बेहद ध्यान रखना होता है। सोशल मीडिया वायरल की मौजूदगी जरा सी बात को भी तूल दे सकने में सक्षम है।

नई पीढ़ी को छोड़कर अगर किसी से पूछा जाए कि किसी अधिकारी का जलवा कब देखा था? तो उसके उसे राजनाथ सिंह की बीजेपी सरकार ही याद आएगी। इसके खुद पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने अधिकारियों पर खूब भरोसा दिखाया।

लेकिन योगी आदित्यनाथ में अपनी ही पार्टी की सरकारों से सीख लेने जैसी कोई बात मौजूद नहीं है क्योंकि उन्हें शायद ऐसी सरकार नहीं चलानी जिसमें अधिकारियों का सहयोग हो। शायद खुद योगी ही ऐसी सरकार चाहते हैं जिसमें अधिकारी सिर्फ सिर झुकाए दिखाई दें।

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योगी सरकार द्वारा दिए गए सरकारी निर्देश में इस बात का भी जिक्र है कि नेताओं ने कई बार ऐसी शिकायत की थी कि अधिकारी उनकी बात को ज्यादा तवज्जो नहीं देते हैं। शायद सीएम योगी को अपने नेताओं की बात सुनकर वो प्रकरण याद आ गया होगा जब एक बार गोरखपुर के डीएम ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था। तब योगी गोरखपुर के सांसद हुआ करते थे और मामला प्रदेश स्तर पर सुर्खियों में आया था।

गोरखपुर के तत्कालीन डीएम डॉ. हरिओम

2007 में गोरखपुर में सांप्रदायिक तनाव था। योगी आदित्यनाथ तनावग्रस्त इलाके में धरना देने जा रहे थे। जिले के डीएम डॉ. हरिओम ने उन्हें गिरफ्तार करवा दिया था। तब सूबे में मायावती की सरकार थी और योगी 11 दिनों तक जेल में थे। कहा तो यहां तक जाता है कि इसी वजह से संसद में योगी रोए भी थे।

 

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