
नई दिल्ली: हर खूबसूरत ‘हिडन जेम’ के साथ अब एक नई दुविधा जुड़ गई है — शेयर करें तो ओवरटूरिज्म का खतरा, न शेयर करें तो स्वार्थी कहलाएं और स्थानीय लोगों की आजीविका प्रभावित हो। तो सवाल यह है कि क्या इस समस्या का कोई सही समाधान है?
सोशल मीडिया पर अब ‘डेस्टिनेशन गेटकीपिंग’ की चर्चा जोरों पर है। यात्री सोच में पड़ गए हैं कि क्या किसी अनछुए खूबसूरत इलाके को शेयर करना जिम्मेदार पर्यटन है या इसे छुपाना स्वार्थीपन है?
दोनों पक्षों की दलीलें
कई यात्री जैसे एकता माथुर कहती हैं कि वे जानबूझकर लोकेशन नहीं डालतीं। वे कुछ चुनिंदा लोगों को बताती हैं ताकि स्थानीय परिवार की आजीविका बढ़े, लेकिन इंस्टाग्राम पर लोकेशन टैग नहीं करतीं।
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञ इसे अल्पकालिक समाधान मानते हैं। मंदीप सिंह सोइन (Responsible Tourism Society of India) कहते हैं कि गेटकीपिंग भावना से निकलती है, लेकिन लंबे समय में यह टिकाऊ नहीं है। आखिरकार जगहें किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाती हैं।
आजीविका vs संरक्षण
कुछ लोग गेटकीपिंग को elitist मानते हैं। फोटोग्राफर रोहन शर्मा कहते हैं कि पर्यटन न होने से गांवों के परिवारों की कमाई रुक जाती है। वहीं दूसरी तरफ, कुछ का मानना है कि पर्यटन आलसी तरीका है, सरकार को स्थानीय लोगों के लिए बेहतर आजीविका के विकल्प बनाने चाहिए।
जिम्मेदार पर्यटक कैसे बनें?
- कचरा साथ में लेकर आएं और प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करें
- भीड़भाड़ वाले स्पॉट के अलावा आस-पास के अन्य खूबसूरत जगहों को भी प्रमोट करें
- ऑफ-सीजन में यात्रा करें
- होमस्टे या होटल की सस्टेनेबिलिटी चेक करें
- लोकल होस्ट को क्रेडिट दें, सिर्फ व्यू पॉइंट टैग न करें
- गलत मौसम या कठिन रास्ते की जानकारी भी शेयर करें
निष्कर्ष
गेटकीपिंग जगह को कुछ समय के लिए बचा सकती है, लेकिन असली समाधान जिम्मेदार पर्यटन है। सरकार, उद्योग और हम यात्रियों — तीनों को मिलकर काम करना होगा।



