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यूपीआई एमडीआर विवाद पर वित्त मंत्रालय की दोटूक: विदेशी दबाव के दावे निराधार, आम जनता के लिए लेनदेन रहेगा पूरी तरह मुफ्त

भारतीय यूपीआई इकोसिस्टम में मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर किए जा रहे बदलावों पर उठ रहे सवालों और विदेशी दबाव की अटकलों पर केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्थिति पूरी तरह से स्पष्ट कर दी है।

मंत्रालय ने बुधवार को उन सभी भ्रामक दावों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें यह कहा जा रहा था कि यूपीआई के नीतिगत निर्णयों में किसी भी प्रकार का विदेशी प्रभाव या हस्तक्षेप शामिल है। सरकार ने दोटूक शब्दों में कहा है कि भारत अपने डिजिटल पेमेंट नेटवर्क से जुड़े सभी अहम और नीतिगत फैसले पूरी तरह से स्वतंत्र होकर अपनी शर्तों पर लेता है, और विदेशी दबाव की बातें कोरी अफवाह और बेबुनियाद हैं।

साल 2016 में अपनी शुरुआत के बाद से ही यूपीआई ने अभूतपूर्व कामयाबी हासिल करते हुए खुद को दुनिया के सबसे बड़े रियल-टाइम पेमेंट सिस्टम के रूप में मजबूती से स्थापित किया है। यह शानदार सफलता भारत की अपनी दूरदर्शी नीतियों और तकनीकी क्षमता पर आधारित है। वित्त मंत्रालय द्वारा साझा किए गए ताजा आंकड़ों के अनुसार, डिजिटल क्रांति को गति देते हुए केवल इसी वर्ष अगस्त महीने में यूपीआई के माध्यम से 24.5 अरब से अधिक रिकॉर्ड ट्रांजैक्शन सफलतापूर्वक पूरे किए गए हैं।

सरकार का मुख्य उद्देश्य देश में एक आत्मनिर्भर, समावेशी और सस्ता डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम तैयार करना है। इसी विशाल तकनीकी ढांचे को भविष्य के लिए अधिक सुरक्षित, नवोन्मेषी और आर्थिक रूप से टिकाऊ बनाए रखने के दृष्टिकोण से केवल बहुत बड़े और उच्च मूल्य वाले लेनदेन पर ही एक मामूली फीस लगाने का प्रस्ताव पेश किया गया है।

इस नए बदलाव और प्रस्ताव के बीच सरकार ने आम जनता और छोटे उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए यह पुख्ता आश्वासन दिया है कि इस नीति का उनकी जेब पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा। करोड़ों आम ग्राहकों के लिए यूपीआई का दैनिक इस्तेमाल पहले की तरह ही पूरी तरह से मुफ्त बना रहेगा। दोस्तों या रिश्तेदारों को पैसे भेजना हो, दुकानों पर खरीदारी का डिजिटल पेमेंट करना हो या कोई भी क्यूआर कोड स्कैन करना हो, इन सभी रोजमर्रा के लेनदेन पर ग्राहकों से कोई भी अतिरिक्त चार्ज नहीं वसूला जाएगा।

वहीं, इस फैसले की गंभीरता को लेकर शीर्ष सरकारी सूत्रों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि बड़े लेनदेन पर मामूली फीस का यह कदम बहुत सोच-समझकर और लंबी आर्थिक रणनीति के तहत उठाया गया है, इसलिए सरकार के इस फैसले से पीछे हटने या इसे वापस लेने का अब कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।

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