सियासत का वो ‘अटल’ नाम जिसके हाथों पहली बार हारी कांग्रेस!

अमित विक्रम शुक्ला

वर्तमान की राजनीतिक परिपाटी पर अगर कोई पार्टी है। जोकि दिन दूनी-रात चौगुनी रफ़्तार से तरक्की कर रही है, तो वो है भारतीय जनता पार्टी। ये हम नहीं बल्कि चुनावी आंकडें बोल रहे हैं। खासतौर पर 2014 के बाद से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने कई सियासी जीत हासिल की। जिसके बाद से पार्टी और प्रधानमंत्री मोदी के कद में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई।

अटल बिहारी वाजपेयी

लेकिन सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश में ये सब कैसे मुमकिन हो सका। आखिर भारतीय जनता पार्टी को सियासी अखाड़े में किसने खड़ा किया। कौन है वो राजनेता जिसके मेहनत और साहस ने भाजपा को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया।

इस सभी सवालों का एक ही जवाब है। और वो है अटल बिहारी वाजपेयी। वैसे इस नाम से कौन वाकिफ नहीं होगा। जिसने भी ‘राजनीति’ शब्द सुना होगा। जाहिर है उसने वाजपेयी का नाम भी सुना होगा।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक प्रतिष्ठित नेता हैं। उन्हें सांस्कृतिक समभाव, उदारवाद और राजनीतिक तर्कसंगतता के लिए जाना जाता है।

पंडित जवाहर लाल के बाद अगर कोई नेता तीन बार भारत का प्रधानमंत्री बना, तो वो अटल बिहारी वाजपेयी ही हैं। उन्ही के कार्यकाल में भारत ने पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण किया। ये कहना कतई गलत नहीं होगा कि उसी सफल परीक्षण के बाद भारत एक नया देश बनकर उभरा।

आज़ादी के बाद से अटल बिहारी के नेतृत्व में ही पहली बार गैर-कांग्रेस सरकार बनी। जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। मतलब साफ़ है कि कांग्रेस के नाव में छेद तो वाजपेयी ने ही किया था. जोकि मोदी के आते-आते डूब ही गयी.

अटल बिहारी वाजपेयी का शुरुआती जीवन

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर (मध्य प्रदेश) में मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता एक कवि होने के साथ ही स्कूल में शिक्षक थे।

वाजपेयी की शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर में हुई। उसके बाद में उन्होंने विक्टोरिया कॉलेज ग्वालियर। जोकि अब लक्ष्मी बाई कॉलेज से जाना जाता है। कानपुर के एंग्लो-वैदिक कॉलेज से वाजपेयी ने राजनीतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की।

अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रतिष्ठित कवि, पत्रकार और बेहतरीन वक्ता हैं। वाजपेयी 1939 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े और 1947 में उसके प्रचारक बन गए। उन्होंने इस दौरान राष्ट्रधर्म हिंदी मासिक, पांचजन्य हिंदी साप्ताहिक और दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे दैनिक अखबारों के लिए भी काम किया।

अटल बिहारी वाजपेयी दृढ़ संकल्पित व्यक्ति हैं। यह सिर्फ राजनीति में ही नहीं बल्कि उनके विवाह के सम्बन्ध में देखने को मिला। जब उन्होंने पूरी जिंदगी अविवाहित रहने का प्रण लिया था और रहे भी।

राजनीति से इतर

एक अनुभवी राजनीतिज्ञ और उम्दा प्रधानमंत्री होने के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी एक प्रसिद्ध कवि और सभी राजनीतिक दलों में सबसे लोकप्रिय व्यक्तित्व हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से अलंकृत करने की घोषणा की थी। उनके जन्मदिन 25 दिसंबर को ‘सुशासन दिवस’ के तौर पर मनाया जाता है। अपनी वक्तृत्व कला के लिए प्रसिद्ध, वाजपेयी आजकल बीमार हैं और इस वजह से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।

राजनीतिक योध्या के रूप में अटल करियर

अटल बिहारी वाजपेयी ने एक स्वंतत्रता संग्राम सेनानी के तौर पर करियर शुरू किया था। बाद में वे भारतीय जन संघ (बीजेएस) से जुड़े। यह एक हिंदू दक्षिणपंथी राजनीतिक दल था, जिसका नेतृत्व डॉ. श्याम प्रसाद मुखर्जी करते थे। वे बीजेएस के राष्ट्रीय सचिव बने और उनके पास उत्तरी क्षेत्र का प्रभार था।

बीजेएस के नए नेता के तौर पर वाजपेयी 1957 में पहली बार बलरामपुर से लोकसभा के लिए चुने गए। वे 1968 में जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

बलराज मधोक, नानाजी देशमुख और लालकृष्ण आडवाणी जैसे सहयोगियों की मदद से वाजपेयी ने जन संघ की पहुंच जन जन तक पहुंचाई।

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आंतरिक आपातकाल लागू किया था। विरोधियों का दमन हुआ था। इसके खिलाफ जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन शुरू किया, जिसमें वाजपेयी भी जुड़े।

बता दें जेपी आन्दोलन उस समय का ऐसा आन्दोलन था, जिसके सामने सरकार को भी घुटने टेकने पड़ गये।

जनता पार्टी का गठन

साल 1977 में जन संघ का जनता पार्टी में विलय कर दिया गया। जनता पार्टी एक नया संगठन था। जो इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ कई पार्टियों के एकजुट होने से बना था।

संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी भाषण

साल 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी ने पहली बार केंद्र में सरकार बनाई। उस समय वाजपेयी केंद्रीय मंत्री बने। उन्हें विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई।

विदेश मंत्री के तौर पर वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देने वाले पहले व्यक्ति बन गए।

अटल बिहारी वाजपेयी

1979 में मोरारजी देसाई के इस्तीफे के बाद वाजपेयी का मंत्री पद का करियर भी खत्म हो गया। उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया। लेकिन तब तक वाजपेयी ने खुद को एक दमदार राजनेता के तौर पर स्थापित कर चुके थे।

भारतीय जनता पार्टी

अटल बिहारी वाजपेयी ने लाल कृष्ण आडवाणी, भैरो सिंह शेखावत और बीजेएस के कुछ अन्य नेताओं के साथ मिलकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के समर्थन से 1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन किया।

वे कांग्रेस (आई) सरकार के मुख्य आलोचक हो गए। जो जनता पार्टी सरकार के गिरने के बाद एक बार फिर से सत्ता में आई थी।

वाजपेयी ने ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार’ का कभी भी समर्थन नहीं किया और 1984 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सिख अंगरक्षकों के हाथों हत्या के बाद हुई सिख-विरोधी हिंसा का कड़े शब्दों में विरोध किया था।

ये अनुमान था या अटल सोच

भाजपा 1984 के चुनावों में सिर्फ दो सीटों तक सीमित हो गई थी। वाजपेयी भाजपा अध्यक्ष थे और संसद में विपक्ष के नेता भी। उस दौरान एक वाकया हुआ। जिसने भाजपा के समर्थकों में जान फूंक दी।

दरअसल, उस समय भाजपा के खाते में सिर्फ 2 सीटें थी। जिसके कारण विपक्ष उन्हें हंसी का पात्र बना रहा था। इस पर वाजपेयी ने क्या कहा।

“मेरी बात को गांठ बाँध लें, आज हमारे कम सदस्य होने पर आप (कांग्रेस) हंस रहे हैं। लेकिन वो दिन आएगा। जब पूरे भारत में हमारी सरकार होगी, उस दिन देश आप पर हंसेगा और आपका मजाक उड़ाएगा”

अटल बिहारी वाजपेयी

इसके बाद क्या हुआ। इस बात से आप सभी भलीभांति वाकिफ हैं कि भाजपा चारों दिशाओं में अपना परचम लहरा रही है।

बाबरी विध्वंस- वर्स्ट मिसकैल्कुलेशन

अपने उदारवादी विचारों की वजह से वाजपेयी दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर दु:ख जताया और इसे भाजपा का ‘वर्स्ट मिसकैल्कुलेशन’ बताया था।

अटल बिहारी वाजपेयी

प्रधानमंत्री के तौर पर राजनीतिक सफरनामा (1996 से 2004 तक)

साल 1984 के चुनावों तक भाजपा ने खुद को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दल के तौर पर स्थापित कर लिया था। अब समय था, तो बस पार्टी के उदय का। जिसके लिए भाजपा कार्यकर्ता ने कमर कास ली थी और अंत में वही हुआ। जो वाजपेयी जी की चाहते थे।

वाजपेयी ने 1996 के आम चुनावों के बाद देश के 10वें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली। उस समय लोकसभा चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।

हालांकि, सरकार 13 दिन ही चल सकी। क्योंकि वाजपेयी बहुमत हासिल करने के लिए अन्य पार्टियों का समर्थन नहीं जुटा सके। इस तरह वे भारत के सबसे कम अवधि के प्रधानमंत्री बन गए। भाजपा गठबंधन (एनडीए) 1998 में फिर सत्ता में लौटा। वाजपेयी ने फिर प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ली।

प्रधान मंत्री के तौर पर वाजपेयी के दूसरे कार्यकाल को राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण के लिए जाना जाता है, जो मई 1998 में किया गया था।

अटल बिहारी वाजपेयी

वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस सेवा का फरवरी 1999 में उद्घाटन किया। उन्होंने पाकिस्तान के साथ कश्मीर समेत अन्य सभी विवादों को सुलझाने की पहल की थी।

लेकिन पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध छेड़कर भारत को धोखा दिया। पाकिस्तानी सैनिक कश्मीर घाटी में घुसपैठ कर आए थे और उन्होंने कारगिल शहर के पास की सीमावर्ती चोटियों पर कब्जा जमा लिया था।

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भारतीय सेना की इकाइयों ने ऑपरेशन ‘विजय’ शुरू किया और कड़कड़ाती ठंड के बीच साहस और वीरता का परिचय देते हुए न केवल चोटी पर बैठे पाकिस्तानी दुश्मन को ठिकाने लगाया। बल्कि उन इलाकों पर तिरंगा लहराकर देश की शान बढ़ाई।

ऑपरेशन ‘विजय’

हालांकि, वाजपेयी की सरकार 13 महीने ही चली, जब अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने 1999 के बीच में सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

पूर्ण बहुमत के सत्ता में वापसी

साल 1999 में एनडीए पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटा और वाजपेयी पांच साल का कार्यकाल (1999-2004) करने में सफल रहे। वे यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री भी बने। वाजपेयी ने 13 अक्टूबर 1999 को तीसरी बार भारत के प्रधान मंत्री के तौर पर शपथ ली थी।

ऑपरेशन ‘विजय’

वाजपेयी सरकार के दौरान कई आर्थिक और इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े सुधार किए गए। इनमें निजी क्षेत्र और विदेशी निवेश को बढ़ावा देना शामिल था। नेशनल हाईवे डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स और प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी कुछ योजनाएं शुरू की।

वाजपेयी ने व्यापार-हितैषी, मुक्त-बाजार सुधार के साथ-साथ भारत के आर्थिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण फैसले लिए थे।

मार्च 2000 में वाजपेयी ने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रवास के दौरान उनके साथ ऐतिहासिक विजन डॉक्यूमेंट पर हस्ताक्षर किए थे। इस घोषणा पत्र में कई रणनीतिक मुद्दे शामिल थे।

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इस दौरान मुख्य रूप से दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक रिश्तों को मजबूती देने की कोशिश की गई थी।

वाजपेयी ने आगरा समिट के दौरान तत्कालीन पाक राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ मिलकर पाकिस्तान के साथ एक बार फिर शांति बहाल करने की कोशिश की थी। लेकिन बातचीत विफल हो गई क्योंकि मुशर्रफ कश्मीर मुद्दे को अलग रखकर बातचीत आगे बढ़ाने के लिए तैयार ही नहीं हुए।

वाजपेयी के कार्यकाल में 13 दिसंबर 2001 को भारत की संसद पर हमला हुआ था। पाक-समर्थिक आतंकवादियों ने दिल्ली में संसद परिसर में घुसने की कोशिश की थी। भारतीय सुरक्षा बलों ने उनकी कोशिश को नाकाम कर दिया था।

उसी कार्यकाल में 2002 का गोधरा काण्ड भी हुआ। गोधरा रेल हादसे के बाद भड़के गुजरात दंगों की वजह से प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी बहुत दुखी हुए थे।

नरेंद्र मोदी

तभी उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सांप्रदायिक दंगों के बाद ‘राजधर्म’ का पालन करने की सलाह दी थी।

पुरस्कार

पद्म विभूषण (1992), कानपुर यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्टरेट ऑफ फिलोसॉफी (1993) और भारत रत्न (2014)।

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