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यूके में जेल नेल्स पर बैन, क्या भारत को भी टीपीओ युक्त उत्पादों पर रोक लगानी चाहिए?

यूनाइटेड किंगडम में जेल नेल प्रोडक्ट्स पर बैन लगने के बाद भारत में भी नेल पॉलिश की सुरक्षा, लेबलिंग और कॉस्मेटिक रेगुलेशन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। यूके ने ट्राइमिथाइलबेंजॉयल डिफेनिलफॉस्फीन ऑक्साइड (टीपीओ) नामक घटक वाले नए जेल नेल उत्पादों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है।

कई महिलाओं के लिए मैनीक्योर या जेल नेल्स लगवाना थेरेपी जैसा अनुभव होता है। चमकदार और सुंदर नेल्स देखने का आनंद अलग ही होता है। लेकिन यूके के इस फैसले ने नेल पॉलिश की सुरक्षा को फिर से चर्चा में ला दिया है। भारत में जहां हाथों से खाना खाने, गूंथने और सामग्री संभालने की संस्कृति है, वहां यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत को भी इसी तरह के प्रतिबंध पर विचार करना चाहिए।

यूके में ‘जेल नेल बैन’ क्या है?
इसे जेल नेल बैन कहा जा रहा है, लेकिन असल में प्रतिबंध मैनीक्योर पर नहीं बल्कि एक घटक टीपीओ पर है, जो जेल नेल पॉलिश में अक्सर पाया जाता है। पिछले साल यूरोपीय संघ ने भी इसके प्रजनन संबंधी विषाक्तता के कारण बैन की घोषणा की थी। टीपीओ को कैंसरकारी, उत्परिवर्तनी और प्रजनन विषैला (सीएमआर) घटक माना गया है। यह एक फोटोइनिशिएटर है, जो यूवी या एलईडी लाइट के संपर्क में आने पर जेल पॉलिश को कठोर और टिकाऊ बनाता है। बैन 15 अगस्त 2026 से प्रभावी हो गया है, लेकिन सैलून को मौजूदा स्टॉक खत्म करने के लिए फरवरी 2027 तक का समय दिया गया है। अब टीपीओ युक्त नए उत्पाद नहीं बेचे जा सकेंगे।

टीपीओ के बारे में जरूरी बातें
यह पदार्थ सभी नेल पॉलिश या जेल उत्पादों में नहीं होता। पारंपरिक एयर-ड्राई नेल पॉलिश में कोई फोटोइनिशिएटर नहीं होता।

कम समय में बार-बार संपर्क से एलर्जिक या इरिटेंट कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस हो सकता है, जिससे नेल्स के आसपास की त्वचा लाल, खुजलीदार, दर्दनाक या फफोले वाली हो सकती है। इससे नेल्स टूटने या अलग होने की समस्या भी हो सकती है।

लंबे समय के खतरे ज्यादा गंभीर हैं। उच्च खुराक वाले पशु अध्ययनों में टीपीओ को हार्मोन व्यवधान, प्रजनन विषाक्तता (बांझपन और जन्म दोष सहित) तथा संभावित कैंसर जोखिम से जोड़ा गया है। इसके अलावा, जेल को कठोर करने वाली यूवी लाइट के लंबे संपर्क से भी जोखिम हो सकता है।

अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, दिल्ली के सीनियर कंसल्टेंट डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. संदीप अरोड़ा कहते हैं, “जेल नेल उत्पादों में टीपीओ की मात्रा बहुत कम होती है, इसलिए इन जोखिमों को हर व्यक्ति पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता। स्वास्थ्य जोखिम मात्रा, आवृत्ति, अवधि और संपर्क के तरीके पर निर्भर करता है।” विशेषज्ञ इसे एहतियाती कदम मानते हैं।

नेल पॉलिश की लेबलिंग पढ़ें
जैसे हम खाने में कार्ब्स, कैलोरी और प्रोटीन देखते हैं, वैसे ही नेल पेंट्स की सामग्री भी जांचनी चाहिए। सैलून वर्कर्स को इन पदार्थों का रोजाना संपर्क ज्यादा होता है। एरेटे हॉस्पिटल्स की सीनियर कंसल्टेंट क्लिनिकल एंड एस्थेटिक डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. सुनीता पेंड्याल चेतावनी देती हैं कि टीपीओ के अलावा जेल उत्पादों में एचईएमए और एचपीएमए जैसे घटक हो सकते हैं, जबकि पारंपरिक पॉलिश में फॉर्मेल्डिहाइड, कैम्फर, टॉल्यूइन और जाइलीन हो सकते हैं। जोखिम व्यक्ति के अनुसार अलग-अलग होता है।

क्या भारत को टीपीओ आधारित जेल नेल्स पर बैन लगाना चाहिए?
डॉ. पेंड्याल स्पष्ट करती हैं कि नेल पॉलिश के छोटे टुकड़े अगर खाने में मिल भी जाएं तो मात्रा बहुत कम होने के कारण आमतौर पर नुकसान नहीं होता। डॉ. अरोड़ा कहते हैं कि हाथों से भोजन छूने का मतलब यह नहीं कि नेल उत्पाद का कोई पदार्थ शरीर में जा रहा है। संपर्क उत्पाद के प्रकार, फॉर्मूला और स्थिति पर निर्भर करता है।

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि भारत को कॉस्मेटिक्स उद्योग के लिए सख्त नियम और लेबलिंग मानदंड बनाने चाहिए। तत्काल बैन के लिए और शोध जरूरी है, लेकिन सभी कॉस्मेटिक उत्पादों पर निर्माण तिथि, शेल्फ लाइफ और खुलने के बाद की एक्सपायरी डेट स्पष्ट होनी चाहिए। सभी सामग्री विस्तार से लिखी जानी चाहिए। कई ब्रांड और ई-कॉमर्स साइट्स अभी भी पूरी सूची नहीं देते।

अगली मैनीक्योर से पहले ध्यान रखें
डॉ. पेंड्याल सलाह देती हैं कि गंध, कंसिस्टेंसी या कठोरता में बदलाव और किसी भी एलर्जिक प्रतिक्रिया पर ध्यान दें तथा उस ब्रांड की संरचना नोट करें। जाने-माने कंपनियों के स्पष्ट सामग्री सूची वाले उत्पादों को प्राथमिकता दें।

डॉ. अरोड़ा के अनुसार जो लोग जेल फॉर्मूला से दूर रहना चाहते हैं, वे पारंपरिक एयर-ड्राई नेल पॉलिश चुन सकते हैं, जिसमें यूवी क्योरिंग की जरूरत नहीं होती।

थोड़ी जागरूकता से आप सुरक्षित तरीके से अपनी नेल्स को सुंदर बना सकते हैं।

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