
कर्नाटक सरकार ने स्पष्ट किया है कि हाल ही में प्रस्तुत जाति जनगणना (सोशियो-इकोनॉमिक सर्वे) के आंकड़ों का उपयोग आरक्षण नीतियों को तय करने के लिए नहीं किया जाएगा। इसके बजाय, इन आंकड़ों का इस्तेमाल सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं तैयार करने में किया जाएगा।
यह बयान कर्नाटक के गृहमंत्री डॉ. जी. परमेश्वर ने 19 सितंबर 2025 को दिया, जिसने राज्य में चल रही जाति जनगणना और आरक्षण को लेकर चर्चाओं को एक नया मोड़ दिया है।
जाति जनगणना का उद्देश्य
कर्नाटक में 2015 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के नेतृत्व में कनकपुरा आयोग द्वारा कराई गई सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वे (जाति जनगणना) की रिपोर्ट हाल ही में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सौंपी गई थी। इस सर्वे का उद्देश्य राज्य की विभिन्न जातियों और समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करना था। गृहमंत्री ने कहा कि इस डेटा का उपयोग उन समुदायों की पहचान करने के लिए होगा, जो शिक्षा, रोजगार, और अन्य बुनियादी सुविधाओं में पिछड़े हैं, ताकि उनके लिए लक्षित कल्याणकारी योजनाएं बनाई जा सकें।
गृहमंत्री का बयान: डॉ. परमेश्वर ने कहा, “जाति जनगणना का उद्देश्य आरक्षण को बढ़ाने या घटाने के लिए नहीं है। यह डेटा हमें यह समझने में मदद करेगा कि कौन से समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा वंचित हैं। इसके आधार पर सरकार जरूरतमंदों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार जैसे क्षेत्रों में योजनाएं बनाएगी।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सर्वे केंद्र सरकार की जनगणना से अलग है और इसका मकसद केवल कर्नाटक के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को मजबूत करना है।
पृष्ठभूमि और विवाद
कर्नाटक में जाति जनगणना लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। 2015 में शुरू हुए इस सर्वे की रिपोर्ट को कई सालों तक सार्वजनिक नहीं किया गया था, जिसके कारण विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों में असंतोष था। कुछ समुदायों, विशेष रूप से लिंगायत और वोक्कालिगा, ने आशंका जताई थी कि इस डेटा का उपयोग आरक्षण नीतियों में बदलाव के लिए किया जा सकता है, जिससे उनके मौजूदा आरक्षण कोटे पर असर पड़ सकता है। गृहमंत्री के बयान ने इन आशंकाओं को कम करने की कोशिश की है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
- कांग्रेस: सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी ने गृहमंत्री के बयान का समर्थन किया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि जाति जनगणना का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, न कि किसी समुदाय के अधिकारों को कम करना।
- बीजेपी: विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इस सर्वे पर सवाल उठाए हैं। बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह डेटा यदि पारदर्शी तरीके से उपयोग नहीं किया गया, तो यह सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है। उन्होंने मांग की है कि सर्वे की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
- जेडी(एस): जनता दल (सेकुलर) ने भी सरकार से पारदर्शिता की मांग की है और कहा है कि डेटा का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
संभावित प्रभाव
- कल्याणकारी योजनाएं: इस डेटा के आधार पर सरकार शिक्षा, स्वास्थ्य, और रोजगार के क्षेत्र में लक्षित योजनाएं शुरू कर सकती है, जैसे कि पिछड़े समुदायों के लिए स्कॉलरशिप, कौशल विकास कार्यक्रम, और स्वास्थ्य सुविधाएं।
- सामाजिक समरसता: गृहमंत्री के बयान से उन समुदायों को आश्वासन मिल सकता है, जो आरक्षण में बदलाव की आशंका से चिंतित थे। हालांकि, डेटा के उपयोग में पारदर्शिता जरूरी होगी।
- राजनीतिक बहस: यह मुद्दा कर्नाटक में 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों के बीच बहस का केंद्र बन सकता है, क्योंकि जाति और आरक्षण राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।





