कल्पवास क्या है? जानिए कल्पवास जीवनशैली से जुड़े स्वास्थ्य लाभ
प्रयागराज (इलाहाबाद) के संगम तट पर गंगा के किनारे होने वाले कुंभ का महत्व न केवल धार्मिक और आत्मिक शांति के लिए है बल्कि ये हमारे शारीरिक स्वास्थ्य को भी बेहतर बनाता है।
कुंभ के दौरान यहां रहने वाले श्रद्धालु कल्पवासी कहलाते हैं। जानकारों का मत है कि 45 दिनों का कल्पवास रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ कई तरह से हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है।
कल्पवास क्या है
कल्पवास का मतलब है संगम तट पर निवास कर वेदाध्ययन और ध्यान करना। इसमें लोग अपना घर छोड़कर 45 दिनों तक गंगा के किनारे तंबू (कुटिया) लगाकर रहते हैं। विधि के अनुसार कल्पवास की जीवनशैली को अपनाते हैं। इसकी शुरूआत मकरसंक्रांति को पहले स्नान से होती है।
कल्पवास पौष महीने के 11वें दिन से माघ महीने के 12वें दिन तक रहता है। इस दौरान लोग तप, दान और विश्व शांति के लिए यज्ञ करते हैं। कल्पवास के दौरान रोजाना गंगा स्नान, ध्यान और साधु-संतों के बीच सत्संग में हिस्सा लेते हैं।
कल्पवासियों का आहार बहुत ही साधारण और नियमत: होता है। कल्पवास की जीवनशैली ही स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए जिम्मेदार मानी जाती है।
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कल्पवासियों की जीवनशैली
- सुर्योदय से पहले उठकर, नित्यक्रिया के बाद गंगा में स्नान।
- 24 घंटे में तीन बार गंगा स्नान करना होता है। पहला स्नान सूर्योदय से पूर्व, दूसरा दोपहर व तीसरा शाम को होता है।
- प्रतिदिन यथासंभव दान-पुण्य करना।
- 24 घंटे में सिर्फ एक बार भोजन करना।
- सात्विक भोजन ही करना होता है।
- सुख हो या दुख मेला क्षेत्र छोड़कर जाना नहीं।
- जमीन में सोना। हर प्रकार की सुख- सुविधाओं से दूर रहना।
- खाली समय पर सोने के बजाय धार्मिक पुस्तकों का पाठ करना।
- हमेशा सत्य बोलना। मन में किसी के प्रति गलत विचार न लाना।
- 24 घंटे में कम से कम चार घंटे प्रवचन सुनना। शालीन वस्त्र धारण करना।
- प्रतिदिन संतों को भोजन कराने के बाद कुछ खाना। गंगा जल का पान करना।
कल्पवास के स्वास्थ्य लाभ
कल्पवास को यदि वैज्ञानिक नजरिए से देखा जाए ये बात निकलकर सामने आती है कि हमारा शरीर जब रोग फैलाने वाले जीवाणुओं, विषाणुओं जैसे सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं तो हमारा शरीर उनके खिलाफ एंटीबॉडी बनाता है। एंटीबॉडी प्रोटीन के बने ऐसे कण हैं जो हमारे शरीर की कोशिकाओं में बनते हैं और बीमारियों से शरीर की रक्षा करते हैं।
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वैज्ञानिकों की मानें तो, कल्पवास करने आए दूसरे कल्पवासियों के शरीर में मौजूद नए रोगों और रोग फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आते हैं, जोकि पहले से ही प्रकृति में मौजूद होते हैं।
इसके फलस्वस्रूप उनके शरीर में इन रोगों के खिलाफ एंटीबॉडीज बननी शुरू हो जाती हैं। बार-बार स्नान करने से शुरूआती दिनों में ही शरीर में बड़ी मात्रा में एंटीबॉडी बनती हैं।
इससे शरीर में रोग नहीं पनप पाते हैं और रोगों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता पैदा होने लगती है। इस तरह से डेंगू, चिकनगुनिया, टीबी और ऐसी दूसरी बीमारियों के खिलाफ शरीर मजबूत हो जाता है।
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इस पर और अध्ययन जारी है
कल्पवास करने के वैज्ञानिक आधारों के तथ्यों को समझने के लिए भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा इस साल कुंभ में अध्ययन किया जा रहा है, जिस पर कुंभ के समापन के बाद रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
इस दौरान शोधकर्ता नदी के पानी और मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर उनकी भौतिक, रासायनिक और सूक्ष्मजीव संबंधी विशेषताओं के बारे में जानेंगे। इसके अलावा 1,080 कल्पवासियों के मेडिकल चेक-अप और ब्लड टेस्ट के जरिए स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का विश्लेषण भी कर रहे हैं।
यह मूल्यांकन रोग प्रतिरोध क्षमता के 14 संकेतकों पर आधारित है, जिसमें तनाव और खुशी के हार्मोन (कार्टिसोल, डोपामाइन और सेरोटोनिन) शामिल हैं। इसके अलावा, वैज्ञानिक बड़े पैमाने पर धार्मिक सभा के भू-खगोलीय महत्व का भी अध्ययन करेंगे।
वैज्ञानिक अध्ययन की जानकारी साझा करते हुए, अध्ययन के प्रमुख वैज्ञानिक वाचस्पति त्रिपाठी ने बताया, “हम एंटीबायोटिक प्रतिरोध के युग में जी रहे हैं, एक ऐसी समस्या जो सुपरबग्स जैसी चुनौतियों के साथ कई गुना बढ़ जाती है। इसके विपरीत, कुंभ अनुष्ठान एक तंत्र प्रदान करता है जो स्वाभाविक रूप से इन समस्याओं का मुकाबला करने में मदद करता है।
अध्ययन कुंभ के महत्व को स्थापित करने के लिए आवश्यक साक्ष्य प्रदान करेगा, जो एक वैदिक विरासत है।”