सती : प्रथा नहीं पदवी

ddwप्राचीन भारत में सती नामक कोई प्रथा नहीं थी, जिसका उल्लेख भारत में मुस्लिम आक्रमण और ब्रिटिश कालीन इतिहास में मिलता है। सती वस्तुत: संत स्वभाव वाली महिलाओं की एक पदवी थी। इस आधार पर जानकी को भी सती की पदवी मिली थी। अनेक ऋषियों की पत्नी भी सती पदवी से सुशोभित थीं। पुरुष में कोई भेद नहीं है। ऐसा नहीं कि महिलाओं के लिए ही सत् मार्ग पर चलने का आग्रह था। जो महिलाएं इस मार्ग पर चलीं उन्हें सती कहा गया। इसके साथ ही पुरुषों के लिए भी सत्मार्ग था। मर्यादा अथवा सत्मार्ग पर चलने की स्त्री व पुरुष दोनों से ही समान रूप से अपेक्षा की गयी। सती का यही तात्पर्य है। देश में जब विदेशी आक्रान्ताओं का आक्रमण हुआ, युद्ध क्षेत्र में जब राजा, सैनिक शहीद हुए, तब सती प्रथा इस काल में यह पदवी के रूप में दिखाई देती है। ब्रिटिश काल के बंगाल में भी सतीप्रथा रूप में दिखाई देती है। तब बूढ़े जमींदार कम आयु की युवतियों से विवाह करते थे। कुछ वर्ष बाद वह विधवा हो जाती थी। सम्पत्ति से वंचित करने हेतु जमींदार के परिजन ही उन्हें सती होने को बाध्य करते थे। जबरदस्ती उन्हें अग्नि के हवाले कर दिया जाता था। लाठी, पत्थर लेकर वही परिजन उन्हें आग से बाहर नहीं निकलने देते थे।
अंग्रेंजो ने इस प्रथा पर पाबन्दी लगाकर वाह-वाही लूटी थी। लेकिन इस प्रकार भारतीय सतीविचार की मूल-भावना पर किसी ने विचार नहीं किया। अंग्रेजों तथा उनसे प्रेरित इतिहासकारों ने सती को भारत की प्रथा के रूप में प्रचारित किया। इस बात को साजिश के तहत दबाया गया कि सती एक पदवी थी, क्योंकि ऐसा किया जाता तो पाश्चात्य सभ्यता – संस्कृति के यहां प्रचार -प्रसार में बाधा पहुंचती। सत् मार्ग पर चलने वाले पुरूष व स्त्री समान रूप से भावी पीढ़ी को उसी राह पर चलने की प्रेरणा देते। पाश्चात्य चिन्तन में महिलाओं को इतना महत्व ही नहीं दिया गया कि उन्हें सती की पदवी मिल सके। लेकिन हमारे विद्वानों ने भी यह नहीं बताया कि सती एक पदवी थी। इसे आग में जलने वाली प्रथा से जोडऩा अनुचित था। यह बात लक्ष्यों पर आधारित थी। प्राचीन भारत में जीवित महिलाओं को सती का दर्जा या पदवी मिलती थी। इसमें तप का बल होता था। धार्मिक क्रिया कलापों व जीवन आचरण में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार थे। दोनों मिल कर तप व सत के मार्ग पर चलने के कारण विशिष्ट पदवी प्राप्त करते थे। इन्हें सती या सन्त की पदवी के लिए चमत्कार नहीं दिखाने होते थे। यह सब जीवन शैली से ही प्रमाणित हो जाता था।
पेड़ लगाने का पुण्य प्राचीन गुरूकुलों के गुरू अपने शिष्यों के साथ मिलकर खूब वृक्षारोपण करते थे। इसको बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक राशि के लिए वृक्षों का चयन किया गया। प्रत्येक राशि को किसी न किसी वृक्ष से जोड़ा गया। प्रेरित किया गया कि संबंधित वृक्ष को लगाने व उसकी देख-भाल करने से पुण्य मिलता है। प्रभु राम वनवास के समय जहां भी रूके, वहां उन्होंने वृक्षारोपण किया। विश्व के किसी अन्य चिंतन में वृक्षों में प्राण तत्व नहीं देखा गया। हमारे ऋषियों ने इसे प्रारम्भ में ही देख लिया था। वृक्षों को काटने से उन्हें पीड़ा होती है। जब उन्हें जल दिया जाता हैं तब उन्हें प्रसन्नता होती है इसी प्रकार हमारे यहां नदियों को महत्व दिया गया। यह चिन्तन प्रकृति से जीवन यापन की न्यूनतम सुविधा लेने की अपेक्षा रखता है। इसमें वर्तमान से अधिक भावी पीढ़ी के कल्याण का विचार समाहित था। उन्हें अच्छे जीवन के अनुकूल पर्यावरण मिलना चाहिए। लेकिन पश्चिम के उपभोग वादी चिन्तन ने वर्तमान पर ही पूरा ध्यान केन्द्रित रखा। अधिकतम उपभोग करने वाले को बड़ा माना गया, भौतिक सुविधाओं के आधार पर सम्मान का निर्धारण होने लगा। इस उपभोगवादी प्रवृत्ति ने पर्यावरण का भीषण संकट उत्पन्न कर दिया है? समस्या इतनी बढ़ चुकी है कि समाधान नजर नहीं आ रहा है। सतही प्रयास दिए जाते है, लेकिन ऐसा लगता है कि स्थिति को संभालने में मानवीय क्षमता विफल साबित हो रही है।
शीतल शिला राम कथा से जुड़े ऐसे अनेक रहस्य है, जिनका आधुनिक विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है। इसे केवल आस्था से ही समझा जा सकता है, उसका अनुभव किया जा सकता है। श्री लंका में आज भी वह पर्वत है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे संजीवनी लेने गए हनुमान जी उठा कर लाए थे। रहस्य की बात यह है कि एक मात्र इसी पर्वत पर आज भी वही पेड़-पौधे उत्पन्न होते है, जो हिमालय क्षेत्र में होते है। इस हिस्से को छोड़ कर श्री लंका में ऐसी वनस्पति कहीं दिखाई नहीं देती।
इसी प्रकार चित्रकूट में एक ऐसी शिला है जो पचास डिग्री तापमान होने के बावजूद भी शीतल रहती है, जबकि आस-पास की सभी शिलाएं ऐसे तपती है कि उनपर हाथ रखना भी संभव नहीं होता। मान्यता के लिए जिस प्रकार का भाव स्तर चाहिए, उसका उनके पास नितान्त अभाव है। ऐसे कथित विद्वानों ने इन ऐतिहासिक तथ्यों को कपोल कल्पना माना है। इन्होंने पाठ्यक्रमों को बिगाड़ा है। आज इसमें सुधार की आवश्यकता है। (हिफी)

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