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जहां बीता लक्ष्मीबाई का बचपन और हुआ था सीता का त्याग जानिए उस जगह के बारे में…

गंगा किनारे बसे बिठूरलखनऊ : गंगा किनारे बसे बिठूर का नाम इतिहास में दर्ज है. इस पावन जगह से कई कथाएं और घटनाएं जुड़ी हुई हैं. यह कानपुर से 22 किमी की दूरी पर बसा हुआ है. यह गंगा किनारे स्थित छोटा सा कस्बा है. बिठूर 52 घाटों की नगरी के नाम प्रसिद्ध है. लेकिन वर्तमान में 29 घाट मौजूद है. यह जगह धार्मिक और पर्यटन के लिए बहुत खास है.

इसी जगह पर संत वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी. यहीं पर राम ने सीता का त्याग किया था.

कार्तिक पूर्णिमा के दिन कार्तिक अथवा कतकी मेला भी मशहूर है.

ऐसा कहा जाता है कि बिठूर में ही ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी. उसके बाद अश्वमेध यज्ञ किया. यज्ञ के स्थान पर घोड़े की नाल वहां लगाई गई थी, आज भी ब्रह्मावर्त घाट के ऊपर लगी हुई है.

तीसरा मराठा युद्ध हारने के बाद साल 1818 में बाजीराव ने अंग्रेजों से पेंशन लेकर बिठूर में रहने का निर्णय किया.

यह नानाराव और तात्या टोपे जैसे लोगों की धरती रही है. आज भी बैरकपुर में टोपे परिवार की एक शाखा है. यहीं झांसी की रानी लक्ष्मी बाई का बचपन बीता.

गंगा किनारे बसे बिठूर की मशहूर जगहें

वैसे तो बिठूर में राम जानकी मंदिर, लव-कुश मंदिर, हरीधाम आश्रम, जंहागीर मस्जिद और नाना साहब स्मारक अन्य कई जगह पर घूमा जा सकता है. लेकिन कई ऐसी जगह है, जहां जाना जरूरी है. वरना यह सफर अधूरा रहता है.

वाल्मीकि आश्रम

इस पवित्र आश्रम में संत वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी. यह आश्रम ऊंचाई पर बना है, जहां पहुंचने के लिए सीढि़यां बनाई गई हैं. इन सीढि़यों को स्वर्ग जाने की सीढ़ी कहा जाता है.

राम ने जब सीता का त्याग किया तो वह यहीं रहने लगीं थीं. इसी आश्रम में सीता ने लव-कुश को जन्म दिया.

ब्रह्मावर्त घाट

इसे बिठूर का सबसे पवित्रतम घाट माना जाता है. भगवान ब्रह्मा के भक्त गंगा नदी में स्नान करने बाद उनकी पूजा करते हैं.  लोगों का मानना है कि भगवान ब्रह्मा ने यहां एक शिवलिंग स्थापित किया था, जिसे ब्रह्मेश्वर महादेव के नाम से मशहूर है.

पाथर घाट

अनोखी निर्माण कला के प्रतीक इस घाट की नींव अवध के मंत्री टिकैत राय ने डाली थी. यह घाट लाल पत्थरों से बनाया गया है. घाट के निकट ही एक शिव मंदिर है. इस मंदिर में कसौटी पत्थर से बना शिवलिंग स्थापित है.

ध्रुव टीला

इसी जगह बालक ध्रुव ने एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी. ध्रुव  की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसे एक दैवीय तारे के रूप में सदैव चमकने का वरदान दिया था.

 

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