Saturday , August 19 2017

बच्‍चों को दे रहे हैं सपनो की नई उड़ान, सहारनपुर के अजय सिंघल

अजय सिंघलए‍क बड़ा मशहूर शेर है-

मंजिल उन्‍ही को मिलती है,जिनके सपनो में जान होती है।

पंख से कुछ नही होता, हौसलों से उड़ान होती है।।

ऐसे ही सपनों को हकीकत में बदलने की उड़ान का नाम है। उत्‍तर प्रदेश के सहारनपुर में रहने वाले अजय सिंघल का जो एलआईसी के लिये काम करते हैं।

यह वो शख्स हैं कि, जब उन्‍होंने सड़क में कचरा बिनने वालें या कोई भी काम-धंधा करते हुए किसी भी बच्‍चे को देखा, तो ना सिर्फ इन बच्चों के बारे में सोचा बल्कि वो जुट गए ऐसे बच्चों को साक्षर करने में, उनकी तकदीर बदलने में। उन्होने अपनी इस मुहिम को नाम दिया है ‘उड़ान’।

आज उस शख्स की बदलौत उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में रहने वाले सैकड़ों बच्चे ना सिर्फ पढ़ना-लिखना सीख रहे हैं, बल्कि इनमें से कई बच्चों ने नियमित स्कूलों में जाना शुरू कर दिया है। वो सिर्फ स्लम में रहने वाले इस बच्चों को ही साक्षर नहीं कर रहे बल्कि वहां रहने वाली लड़कियों और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिये पढ़ाई के साथ साथ सिलाई और ब्यूटिशियन का कोर्स भी करा रहे हैं। खास बात ये हैं अजय पढ़ाई-लिखाई के अलावा वोकेशनल ट्रेनिंग देने का काम मुफ्त में करते हैं।

अजय ने करीब छह साल पहले एक ब्लॉग लिखा था। वो ब्लॉग उन्होने उन बच्चों पर लिखा था जो छोटा मोटा काम धंधा कर गुजारा करते हैं। जैसे चाय की दुकान पर काम करते हैं, सड़क किनारे कूड़ा बीनते हैं या मजदूरी करते हैं। उन्होने अपने ब्लॉग में लिखा था कि अक्सर हम ऐसे बच्चों को देखते तो हैं लेकिन कभी हम ये नहीं सोचते की ये बच्चे स्कूल क्यों नहीं जाते। जिसके बाद अजय के एक दोस्त ऐसे बच्चों की मदद के लिये आगे आये और उन्होने उनसे कहा कि वो ऐसे पांच बच्चों की फीस देने को तैयार हैं। बशर्ते ऐसे बच्चे स्कूल जाने को तैयार हों। अजय सिंघल के मुताबिक “मैं ऐसे बच्चों की तलाश में इंदिरा कैम्प नाम की एक स्लम बस्ती में गया।

ये ऐसी बस्ती थी जहां रहने वाले बच्चे कबाड़ चुनते थे। ये बच्चे सुबह पांच बजे अपने घरों से निकल जाते थे और दोपहर तीन बजे तक ये काम करते थे और यही वक्त स्कूल का भी होता है। इसलिये वो बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे और काम से लौटने के बाद खाली घूमा करते थे।”

ढाई हजार की आबादी वाले इंदिरा कैम्प में बच्चों की संख्या चार सौ के करीब है। बच्चों की इतनी संख्या को देखते हुए अजय सिंघल ने तय किया कि क्यों ना ज्यादा से ज्यादा बच्चों को तालीम दी जाए। इसके लिए जरूरत थी जगह की। जहां पर इन बच्चों को पढ़ाने का काम किया जाये। इसलिये इलाके में मौजूद एक मंदिर की छत पर इन्होने कुछ लोगों के साथ मिलकर करीब सात साल पहले बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया और अपनी इस मुहिम को नाम दिया ‘उड़ान’।

अजय ने इस काम की शुरूआत 32 बच्चों के साथ की थी, लेकिन आज यहां पर 252 बच्चे पढ़ने के लिये आते हैं। इनमें 70 फीसदी लड़कियां हैं। आज ये स्कूल शाम चार बजे से छह बजे तक चलता है। क्योंकि इससे पहले यहां आने वाले बच्चे अपने काम पर जाते हैं।

जब अजय ने देखा की यहां आने वाले कई बच्चे पढ़ाई में होशियार थे इसलिये उन्होने उन बच्चों के लिये शिक्षा का अधिकार (आरटीई) का इस्तेमाल करते हुए स्कूलों में दाखिला कराना शुरू कर दिया। इस तरह ये अब तक स्लम में रहने वाले 44 बच्चों को सरकारी स्कूलों में दाखिला करा चुके हैं। ये सभी बच्चे छठी से लेकर 8वीं क्लास तक में पढ़ रहे हैं। आज इन सभी बच्चों को स्कूल के बाद यहां पढ़ने के लिए आना होता है जहां पर उनको होम वर्क और पढ़ाई कराई जाती है। यही वजह है कि इन 44 बच्चों में से नौ बच्चों ने हाल ही में अपने स्कूल की परीक्षा में पहली से तीसरी रैंक हासिल की।

अजय बताते हैं कि “हमने जब यहां पर बच्चों को पढ़ाने का काम शुरू किया था तो उस वक्त हम चाहते थे कि ये थोड़ा बहुत पढ़ना लिखना सीख जायें, लेकिन धीरे धीरे अब हम 5वीं क्लास का सिलेबस इन बच्चों को पढ़ाते हैं। यही वजह है कि आज हमारी ये मुहिम एक क्लासरूम के माहौल में बदल गई है। हम इन बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, साइंस, गणित के अलावा नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाते हैं।” आज इनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नर्सरी क्लास में जहां पांच साल से 13 साल साल तक का बच्चा है। ऐसे में इन बच्चों की बीच तालमेल बिठाना आसान नही होता है।

अजय की इस मुहिम में 18 और लोग भी शामिल हो चुके हैं जो आर्थिक तौर पर हर महीने मदद करते हैं। इसके अलावा इनके पास वॉलंटियर की एक टीम भी है। यहां पर इन बच्चों को ना सिर्फ मुफ्त में पढ़ाया जाता है बल्कि पढ़ने के लिये किताबें और पेंसिल भी मुफ्त में दी जाती हैं।

इस काम में इनकी आर्थिक मदद कई दूसरे संगठन भी कर रहे हैं। इनमें लॉयंस ग्रुप, भारत विकास परिषद जैसे संगठन हैं। वहीं सहारनपुर के कई स्कूल भी इनकी विभिन्न तरीके से मदद करते हैं। इसके अलावा गुजरात स्थित ‘आश्रय फाउंडेशन’ को जब इनके काम के बारे में पता चला तो वो इनकी मदद को आगे आया। जिसके बाद ‘आश्रय फाउंडेशन’ मदद से इन लोगों ने ना सिर्फ जगह खरीदी बल्कि उस जगह पर एक हॉल तैयार कराया और बाद में स्थानीय लोगों की मदद से पहली मंजिल का निर्माण कराया गया। इस वजह से जहां पहले बच्चों को खुले आसमान के नीचे पढ़ना होता था, वहीं पिछले दो सालों से अब ‘उड़ान’ के पास अपनी एक इमारत हो गई है।

स्लम में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने के दौरान अजय ने महसूस किया कि वहां रहने वाली ऐसी कई महिलाएं और लड़कियां हैं जो पढ़ना चाहती हैं और कुछ काम सीखना चाहती हैं। इसलिए उन्होने करीब तीन साल पहले इंदिरा कैम्प नाम की स्लम बस्ती में रहने वाली महिलाओं को साक्षर बनाने के बारे में सोचा और उनको दोपहर दो से चार बजे तक पढ़ाने का काम शुरू किया।

आज यहां पर बच्चों और महिलाओं को पढ़ाने के लिये 10 टीचरों की नियुक्ति की गई है। इसके अलावा महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिये इन्होने एक सिलाई सेंटर की शुरूआत की। इस सेंटर में 30 महिलाओं का एक बैच होता है। हर बैच की महिलाओं को छह महीने की सिलाई का कोर्स कराया जाता है। महिलाओं और लड़कियों को सिलाई का ये कोर्स मुफ्त में कराया जाता है। महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए कोर्स पूरा करने के बाद इनके बीच प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है और जो पांच महिलाएं उस प्रतियोगिता में विजयी होती हैं उनके ये मुफ्त में सिलाई मशीन भी देते हैं। महिलाओं के इस ओर बढ़ते रूझान को देखते हुए इन लोगों ने दो महीने पहले ब्यूटिशियन का कोर्स भी शुरू किया है। जिसमें युवा लड़कियों की संख्या काफी ज्यादा है। इसमें भी 30 महिलाओं और लड़कियों का एक बैच होता है। जिसको ये लोग ब्यूटिशियन की ट्रेनिंग देते हैं।

पढ़ाई और रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के अलावा अजय ने स्लम में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर भी जोर देना शुरू किया। इसके लिए इन्होने ‘उड़ान’ की बिल्डिंग में ही एक डिस्पेंसरी की व्यवस्था की है। इसे उन्होने ‘उड़ान चेरिटेबल डिस्पेंसरी’ का नाम दिया है। इस डिस्पेंसरी में नियमित तौर पर डॉक्टर सुरेंद्र देव शर्मा नाम के एक एमबीबीएस डॉक्टर बैठते हैं। जो किसी तरह की कोई फीस नहीं लेते। खास बात ये है कि यहां पर लोगों को सिर्फ जेनरिक दवाएं ही दी जाती हैं। यही वजह है कि आज स्लम में रहने वाला कोई भी व्यक्ति यहां पर 10 रुपये की फीस देकर अपना इलाज करा सकता है। इस फीस में दवाओं का दाम भी शामिल होता है।

अजय बताते हैं कि वे ये सारा काम ‘क्रेजी ग्रीन’ नाम के एक संगठन के जरिये करते हैं। जिसमें उनके साथ काम करने वालों की फौज है। उनकी टीम में हर सदस्य को अलग अलग जिम्मेदारी दी गई है। इसलिये आज वो अपने दोस्तों और साथियों की मदद से इस काम को करने में सफल हुए हैं।

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