
उत्तर प्रदेश के पूर्व कद्दावर मंत्री आजम खां और उनके परिजनों से जुड़े मोहम्मद अली जौहर ट्रस्ट की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय मामलों की गहन पड़ताल के बाद आयकर विभाग ने अब अपनी कार्रवाई का अगला और बेहद कड़ा चरण शुरू कर दिया है। ट्रस्ट का पंजीकरण पहले ही रद्द किए जाने के बाद अब विभाग करीब ₹450 करोड़ की कथित अघोषित आय पर भारी टैक्स, जुर्माना और ब्याज वसूलने की रूपरेखा तैयार कर रहा है।
सभी देनदारियों और जुर्माने को मिलाकर यह कुल वसूली राशि ₹500 करोड़ से भी अधिक पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। इस बड़ी वसूली प्रक्रिया को अंतिम रूप देने और विधिक कार्रवाई आगे बढ़ाने के लिए आयकर विभाग ने अपने केंद्रीय मुख्यालय से औपचारिक अनुमति मांगी है।
आयकर विभाग की अब तक की जांच में जौहर ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन और संचालन में गंभीर अनियमितताओं की बात उजागर हुई है। विभागीय सूत्रों के दावों के अनुसार, ट्रस्ट ने नियमों की अनदेखी करते हुए कथित तौर पर फर्जी लोगों को ट्रस्टी दिखाया और उनके नाम पर करोड़ों रुपये का चंदा जुटाया।
इसके साथ ही, जौहर विश्वविद्यालय परिसर में कई विशाल भवनों और संरचनाओं के निर्माण में सरकारी विभागों के धन का दुरुपयोग करने का मामला भी वित्तीय जांच के केंद्र में है। विभाग का मानना है कि सरकारी संसाधनों और नियमों को ताक पर रखकर इस पूरे ढांचे को खड़ा किया गया।
इस पूरे प्रकरण में आयकर विभाग ने नियमों के अनुरूप जौहर ट्रस्ट के पदाधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिए सिलसिलेवार नोटिस जारी किए थे। हालांकि, विभागीय अधिकारियों के मुताबिक, ट्रस्ट के जिम्मेदार लोग जांच टीम के समक्ष करोड़ों रुपये की इस अकूत आय के वैध स्रोतों का कोई स्पष्ट और संतोषजनक विवरण प्रस्तुत नहीं कर सके। आय के वैध स्रोतों की पुष्टि न होने के बाद आयकर विभाग ने इस पूरी अघोषित राशि पर तीस प्रतिशत जुर्माने के साथ-साथ निर्धारित ब्याज की वसूली की कागजी प्रक्रिया तेज कर दी है।
एक तरफ जहां आयकर विभाग का शिकंजा कसता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी जौहर ट्रस्ट से जुड़े वित्तीय मामलों की मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से पड़ताल कर रही है। ईडी की टीमें ट्रस्ट के प्रमुख पदाधिकारियों और संबंधित लोगों से पूछताछ कर चुकी हैं और ट्रस्ट से जुड़ी सभी चल-अचल संपत्तियों का ब्योरा खंगाल रही हैं।
सूत्रों का कहना है कि जांच में यदि यह पूरी तरह सिद्ध होता है कि विश्वविद्यालय के भवनों का निर्माण सरकारी खजाने से मिले धन से किया गया था, तो उन भवनों को कानूनी प्रक्रिया के तहत जब्त भी किया जा सकता है। जांच का दायरा विस्तृत होने के कारण ट्रस्ट से जुड़े कई अन्य लोग और सहयोगी संस्थान भी अब पूरी तरह से जांच एजेंसियों की निगरानी में आ चुके हैं।




