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जानिए… क्यों करना चाहिए महामृत्युंजय मन्त्र का पाठ

 

महामृत्युंजय मन्त्रदेवों के देव महादेव भगवान शंकर की महिमा अपरम पार है। कालों के काल कहे जाने वाले शिव अपने भक्तों के हर संकट को दूर करते है। और हमेशा ही उनकी सहायता के लिए तत्पर रहते हैं। यदि आपकी जन्मकुण्डली में सूर्यादि ग्रहों के द्वारा किसी प्रकार की अनिष्ट की आशंका हो या मारकेश आदि लगने पर, किसी भी प्रकार की भयंकर बीमारी से आक्रान्त होने पर, अपने बन्धु-बन्धुओं तथा इष्ट-मित्रों पर किसी भी प्रकार का संकट आने वाला हो। तो भगवान शंकर के महामृत्युंजय मन्त्र का जाप करके आप सभी परेशानियों से छुटकारा पा सकते हैं।

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देश-विदेश जाने या किसी प्राकर से वियोग होने पर, स्वदेश, राज्य व धन सम्पत्ति विनष्ट होने की स्थिति में, अकाल मृत्यु की शान्ति एंव अपने उपर किसी तरह की मिथ्या दोषारोपण लगने पर, उद्विग्न चित्त एंव धार्मिक कार्यो से मन विचलित होने पर महामृत्युंजय मन्त्र का जप स्त्रोत पाठ, भगवान शंकर की आराधना करनी चाहिए। यदि आप स्वयं ऐसा न कर सके तो किसी पंडित द्वारा आप इस विधि को करा सकते है।

इससे सद्बुद्धि, मनःशान्ति, रोग मुक्ति एंव सवर्था सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है। महामृत्युंजय के अनुष्ठान एंव लधु रूद्र, महारूद्र तथा सामान्य रूद्राअभिषेक प्रायः होते ही रहते है, लेकिन विशेष कामनाओं के लिए शिर्वाचन का अपना अलग विशेष महत्व होता है। महारूद्र सदाशिव को प्रसन्न करने व अपनी सर्वकामना सिद्धि के लिए यहां पर पार्थिव पूजा का विधान है, जिसमें मिटटी के शिर्वाचन पुत्र प्राप्ति के लिए, श्याली चावल के शिर्वाचन व अखण्ड दीपदान की तपस्या होती है।

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शत्रुनाश व व्याधिनाश हेतु नमक के शिर्वाचन, रोग नाश हेतु गाय के गोबर के शिर्वाचन, दस विधि लक्ष्मी प्राप्ति हेतु मक्खन के शिर्वाचन अन्य कई प्रकार के शिवलिंग बनाकर उनमें प्राण-प्रतिष्ठा कर विधि-विधान द्वारा विशेष पुराणोक्त व वेदोक्त विधि से पूज्य होती रहती है। भगवान शिव के इस मंत्र को इस प्रकार उच्चारण करें। 

ऊॅ हौं जूं सः। ऊॅ भूः भुवः स्वः ऊॅ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।

उव्र्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्।।

ऊॅ स्वः भुवः भूः ऊॅ।

ऊॅ सः जूं हौं।।

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