Tuesday , May 22 2018

राज्यपाल ने भाजपा को दिया सरकार बनाने का न्योता, कल सुबह 9:30 बजे येदियुरप्पा लेंगे शपथ

नई दिल्ली। आखिरकार पूरे 24 घंटे बीत जाने के बाद कर्नाटक का नाटक खत्म हो गया है। सुबह से लेकर शाम तक चले इस सियासी खेल का अंत हो गया है। सूबे के राज्यपाल ने वजुभाई वाला ने सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने का दावा पेश करने को कहा है। यानी कल येदुयुरप्पा मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करेंगे।

राज्यपाल ने भाजपा

बता दें भाजपा को 21 मई तक बहुमत साबित करने का समय मिला है।

कर्नाटक के नतीजे सभी दलों के लिए काफी सबक देने वाले हैं। क्योंकि शुरू में लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसर है। लेकिन बाद में 104 पर ही अटक गई। जबकि कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर रह गई।

प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा 21 जन सभाएं कर्नाटक में की थीं वहीं अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी। वोट शेयर के मामले में कांग्रेस जीतकर भी हार गई और भाजपा हारकर भी जीत गई। भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 प्रतिशत और 38 प्रतिशत है।

हां, कर्नाटक में ही इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है। लगभग 2004 वाली स्थिति है। उस वक्त भाजपा को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं।

कांग्रेस एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी जबकि देवगौड़ा एन धरम सिंह को। तब भी कांग्रेस को झुकना पड़ा था। यकीनन देवगौड़ा का ठीक वैसा ही दांव 2018 के इस चुनाव में दिखा जब उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को चित्त कर दिया।

इस चुनाव में फिर रोचक स्थिति बनी कि राजनीति में कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। याद कीजिए 2005 में कुमार स्वामी से मतभेदों के कारण ही सिद्धारमैया पार्टी से निकाले गए थे लेकिन हालात देखिए 12 साल बाद उन्हीं सिद्धारमैया ने अपने राजनैतिक विरोधी का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया।

फिलहाल, कर्नाटक नतीजों को 2019 का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी सबसे अधिक सांसद देने वाले उप्र के कैराना में 28 मई को होने जा रहे उपचुनाव में नए फार्मूले की टेस्टिंग होगी।

यहां सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के चिन्ह पर सपा उम्मीदवार तबस्सुम का लड़ना और बसपा का समर्थन करना बड़ा पैंतरा है। निश्चित रूप से यह जहां भाजपा को परेशान करने वाला है वहीं 2019 के आम चुनाव के लिए गठबंधन की नई संभावनाओं का दरवाजा भी खोलता दिख रहा है। लेकिन मप्र और राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कर्नाटक के नतीजों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

साल के आखिर में मप्र, राजस्थान, छग में विधानसभा चुनाव हैं और यहां भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस जोश में थी। यकीनन कांग्रेस का मनोबल गिरा होगा क्योंकि तीनों राज्यों में मुख्य विपक्षी भूमिका में वही है। साथ ही गठबंधन के लिहाज से तीनों राज्यों की राजनैतिक पैंतरेबाजी भी जुदा है। ऐसे में तीनों राज्य में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा देश की गठबंधन राजनीति में निश्चित रूप से बेहद उलझा और नाजुक होगा। फिलहाल कर्नाटक के नाटक पर सबकी नजर है।

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