
जियो-पॉलिटिकल तनाव कम होने और ईरान-ट्रंप के बीच शांति वार्ता की खबरों से वैश्विक बाजारों में सकारात्मक माहौल बना है, लेकिन भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। आमतौर पर ऐसी स्थिति में उभरती मुद्राएं मजबूत होती हैं, पर इस बार रुपए में घबराहट दिख रही है।
मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 16 पैसे गिरकर 93.32 के स्तर पर पहुंच गया। अमेरिकी डॉलर की मजबूती और रिजर्व बैंक द्वारा सट्टेबाजी संबंधी कुछ पाबंदियों में दी गई ढील इसके प्रमुख कारण बने। इंटरबैंक बाजार में रुपया 93.25 पर खुला और 93.37 तक गिरने के बाद 93.32 पर कारोबार कर रहा था। सोमवार को यह 93.16 पर बंद हुआ था।
आरबीआई का फैसला: रिजर्व बैंक ने 1 अप्रैल को जारी सख्त निर्देशों को आंशिक रूप से वापस ले लिया। अब बैंक नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) बाजार में निवासियों और अनिवासियों को रुपए से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट ऑफर कर सकते हैं, हालांकि संबंधित पक्षों के लेनदेन पर कुछ पाबंदियां बरकरार हैं। इससे पहले इन पाबंदियों ने रुपए को कुछ सहारा दिया था।
डॉलर की ताकत: डॉलर इंडेक्स 0.04 फीसदी बढ़कर 97.94 के आसपास पहुंच गया, जो छह प्रमुख मुद्राओं की टोकरी के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा की मजबूती दर्शाता है। इसके अलावा विदेशी निवेशकों की मुनाफावसूली और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी भी रुपए पर दबाव डाल रही है।
कच्चा तेल और अनिश्चितता: ब्रेंट क्रूड की कीमतें 0.51 फीसदी गिरकर 94.99 डॉलर प्रति बैरल पर थीं, लेकिन ईरान और हORMुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता बनी हुई है। अगर तेल आपूर्ति बाधित हुई तो आयात महंगा हो सकता है, जो रुपए पर अतिरिक्त बोझ डालेगा।
घरेलू शेयर बाजारों में हालांकि तेजी रही। सेंसेक्स 379 अंक बढ़कर 78,899 के स्तर पर और निफ्टी 103 अंक चढ़कर 24,468 पर पहुंचा। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने सोमवार को 2,066 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे।
विश्लेषकों का कहना है कि रुपया अपने जीवनकाल के निचले स्तर से अभी भी करीब 2 रुपये मजबूत है, लेकिन 93 के स्तर के पार जाने से आगे गिरावट के कयास लगाए जा रहे हैं। मार्च में यह 95 के पार चला गया था।
रुपए की यह कमजोरी आयातित मुद्राओं को महंगा कर सकती है, भले ही तेल की कीमतों में थोड़ी राहत मिली हो। बाजार अब आरबीआई के अगले कदमों और वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है।




