
भारत में हेपेटाइटिस बी एक गंभीर और ‘खामोश’ (साइलेंट) खतरे के रूप में उभर रहा है। इसके स्पष्ट लक्षण न होने के कारण करोड़ों लोग इस बात से पूरी तरह अनजान हैं कि वे इस खतरनाक वायरस से संक्रमित हैं। गुरुग्राम स्थित पारस हेल्थ के लीवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. अंकुर गर्ग के अनुसार, भारत में हेपेटाइटिस बी के 4 से 5 करोड़ क्रोनिक (पुराने) मरीज हैं, जो दुनिया भर में दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है।
यह बीमारी कई दशकों तक बिना किसी लक्षण के शरीर में रह सकती है और धीरे-धीरे लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है। पीलिया, थकान या पेट में सूजन जैसे लक्षण आमतौर पर तब दिखाई देते हैं, जब लीवर काफी हद तक खराब हो चुका होता है। ऐसे में लीवर सिरोसिस, लीवर फेलियर या लीवर कैंसर तक का खतरा पैदा हो जाता है। इसके संक्रमण के मुख्य कारणों में जन्म के समय मां से बच्चे में वायरस का जाना या संक्रमित व्यक्ति के रेजर और टूथब्रश जैसी निजी चीजें साझा करना शामिल है। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) स्पष्ट करता है कि यह बीमारी सामान्य सामाजिक संपर्क (जैसे छूने या साथ उठने-बैटने) से नहीं फैलती है।
राहत की बात यह है कि टीकाकरण के जरिए हेपेटाइटिस बी से पूरी तरह बचाव संभव है। भारत ने 2002 में इसे अपने ‘यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम’ (सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम) में शामिल कर लिया था, जिससे इसके बाद जन्मे बच्चों में इम्युनिटी काफी बेहतर हुई है। हालांकि, 2002 से पहले जन्मे करोड़ों लोग अभी भी इस वायरस के प्रति असुरक्षित हैं।
डॉ. गर्ग सलाह देते हैं कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहते हुए सभी को एक बार ‘HBsAg’ ब्लड टेस्ट जरूर कराना चाहिए। यदि टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव आती है, तो तुरंत वैक्सीन लगवाएं। वहीं, यदि रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो घबराने की जरूरत नहीं है; आधुनिक एंटीवायरल दवाओं और नियमित मेडिकल निगरानी से वायरस को नियंत्रित कर सामान्य जीवन जिया जा सकता है। समय रहते जांच और टीकाकरण ही इस साइलेंट संक्रमण से बचने का सबसे प्रभावी उपाय है।




