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एसपीएफ 30 या एसपीएफ 50: आपकी त्वचा के लिए कौन सा सनस्क्रीन है बेहतर? जानें सही चुनाव का तरीका

भारत में गर्मियों की शुरुआत के साथ ही तापमान लगातार बढ़ने लगता है। ऐसे में लोग खुद को डिहाइड्रेशन से बचाने के लिए पानी और तरल पदार्थों का खूब सेवन करते हैं। लेकिन एक और बड़ा खतरा जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, वह है यूवी (UV) रेडिएशन यानी पराबैंगनी किरणें। ये किरणें बादलों वाले दिनों में या थोड़ी देर के लिए बाहर जाने पर भी त्वचा को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।

आमतौर पर लोग यह सोचकर सबसे अधिक एसपीएफ (SPF) वाला सनस्क्रीन खरीद लेते हैं कि यह उन्हें हर तरह के नुकसान से पूरी तरह बचा लेगा। हालांकि, त्वचा रोग विशेषज्ञों (डर्मेटोलॉजिस्ट) का मानना है कि सही सनस्क्रीन चुनने का मतलब केवल एसपीएफ का लेबल देखना नहीं है। एसपीएफ, यूवीए (UVA) और यूवीबी (UVB) का असली मतलब समझकर ही आप अपनी त्वचा की बेहतर सुरक्षा कर सकते हैं।

कॉस्मेटिक डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. पाउला फाखरे के अनुसार, लोग अक्सर इस बात का अंदाजा नहीं लगा पाते हैं कि वे रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान कितनी यूवी किरणों के संपर्क में आते हैं। उनका कहना है कि लोगों को लगता है कि सनस्क्रीन केवल समुद्र तट (बीच) पर जाने के लिए है, लेकिन हम हर दिन यूवी किरणों का सामना करते हैं। चाहे आप काम पर जा रहे हों, इमारतों के बीच चल रहे हों, या खिड़की के पास बैठे हों, धूप में बिताए गए ये छोटे-छोटे पल भी त्वचा को प्रभावित करते हैं। सूर्य मुख्य रूप से तीन प्रकार की पराबैंगनी किरणें उत्सर्जित करता है।

यूवीए (UVA) किरणें त्वचा की गहराई तक प्रवेश करती हैं और समय से पहले बुढ़ापा, झुर्रियां और पिगमेंटेशन का कारण बनती हैं, साथ ही स्किन कैंसर का जोखिम भी बढ़ाती हैं। ये किरणें खिड़की के शीशे के पार भी जा सकती हैं। दूसरी ओर, यूवीबी (UVB) किरणें मुख्य रूप से त्वचा की सबसे बाहरी परत को प्रभावित करती हैं और सनबर्न का कारण बनती हैं। ये भी त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाने और स्किन कैंसर में बड़ा योगदान देती हैं। वहीं, यूवीसी (UVC) किरणें बेहद हानिकारक होती हैं, लेकिन राहत की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर पृथ्वी की ओजोन परत द्वारा ही सोख ली जाती हैं।

सनस्क्रीन और सनब्लॉक, इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल अक्सर एक ही अर्थ में किया जाता है, लेकिन इनके काम करने का तरीका बिल्कुल अलग होता है। केमिकल सनस्क्रीन में ऐसे यौगिक होते हैं जो पराबैंगनी किरणों को सोख लेते हैं और उन्हें गर्मी में बदलकर त्वचा से बाहर निकाल देते हैं। ये उत्पाद वजन में बहुत हल्के होते हैं और त्वचा में आसानी से मिल जाते हैं। इसके विपरीत, मिनरल सनब्लॉक में जिंक ऑक्साइड और टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसे तत्व होते हैं, जो त्वचा के ऊपर एक सुरक्षात्मक परत बना लेते हैं और पराबैंगनी किरणों को त्वचा से टकराकर वापस मोड़ देते हैं। सनब्लॉक लगाते ही तुरंत अपना काम करना शुरू कर देते हैं।

एसपीएफ यानी सन प्रोटेक्शन फैक्टर यह दर्शाता है कि कोई सनस्क्रीन त्वचा को यूवीबी किरणों से बचाने में कितना प्रभावी है। एक एसपीएफ 30 वाला सनस्क्रीन लगभग 97 प्रतिशत यूवीबी किरणों से बचाता है, जबकि एसपीएफ 50 लगभग 98 प्रतिशत किरणों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह एक प्रतिशत का अतिरिक्त बचाव मामूली लग सकता है, लेकिन जिन लोगों की त्वचा बहुत अधिक संवेदनशील या गोरी होती है, या जिन्हें स्किन कैंसर का अधिक खतरा होता है, उनके लिए यह बहुत महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

आपको केवल एसपीएफ नंबर देखकर ही संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि हमेशा ‘ब्रॉड-स्पेक्ट्रम’ सनस्क्रीन चुनना चाहिए जो यूवीए और यूवीबी दोनों से बचाता हो। कोरियाई या जापानी सनस्क्रीन खरीदते समय पीए (PA) रेटिंग देखनी चाहिए, जिसमें PA++++ यूवीए से बचाव का उच्चतम स्तर माना जाता है।

अक्सर लोग सनस्क्रीन की बहुत कम मात्रा का उपयोग करने की गलती करते हैं। चेहरे और गर्दन के लिए डर्मेटोलॉजिस्ट ‘टू-फिंगर रूल’ (दो उंगलियों के बराबर मात्रा) अपनाने की सलाह देते हैं, जबकि पूरे शरीर के लिए लगभग 30 से 35 मिलीलीटर सनस्क्रीन की आवश्यकता होती है। चूंकि कोई भी सनस्क्रीन पूरी तरह से वॉटरप्रूफ नहीं होता, इसलिए इसे हर दो घंटे में दोबारा लगाना चाहिए, खासकर अगर आपको पसीना आ रहा हो, आप तैराकी कर रहे हों या तौलिये से शरीर पोंछा हो।

एक सनस्क्रीन तभी असरदार होता है जब उसे सही तरीके से और पर्याप्त मात्रा में इस्तेमाल किया जाए। नियमित रूप से सनस्क्रीन लगाने के साथ-साथ धूप का चश्मा और टोपी पहनना तथा पीक आवर्स (दोपहर के समय) में सीधी धूप से बचना भी आपकी त्वचा को सूरज की हानिकारक किरणों से सुरक्षित रखने में काफी मदद कर सकता है।

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