आखिर क्यों सुभाष चंद्र बोस को ‘फासीवादी’ की दी गई उपाधि, क्या इसके पीछे थी कोई राजनीतिक चाल!

नई दिल्ली। सुभाषचंद्र बोस उन दिनों लगभग 44 साल के थे, जब उन्होंने 1941 में कोलकाता में ब्रिटिश सरकार को भारत से बाहर करने के लिए अभियान छेड़ दिया और वह अंग्रेजों की नजरबंदी से फरार हो गए।

सुभाष चंद्र बोस
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो बार अध्यक्ष रह चुके सुभाषचंद्र बोस का कद इतना बड़ा था कि महात्मा गांधी भी उनसे निश्चित दूरी बनाकर चल रहे थे। वहीं, जवाहरलाल नेहरू के मुकाबले नेताजी का कद और प्रभाव दोनों बहुत ज्यादा था। लेकिन चार साल बाद जब ताइवान में कथित विमान दुर्घटना हुई, तब परिस्थितियां बदल चुकी थीं। अमेरिकी परमाणु बम ने अंग्रेजों के दुश्मनों को धराशायी कर दिया था। अब सुभाष भारतीय राजनीति में भी ‘फासीवादी’ घोषित होकर अवांछित हो चुके थे।

सुभाष चंद्र बोस
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब मित्र राष्ट्रों में शामिल ब्रिटेन पर अपने साम्राज्य की सुरक्षा का भारी दबाव था, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को भी लगा कि इसका फायदा उठाया जाना चाहिए। तब महात्मा गांधी ने अहिंसक आंदोलन की परंपरा से ऊपर उठते हुए ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन का फैसला किया और ‘करो या मरो’ का नारा दिया। दरअसल इस फैसले के पीछे सुभाषचंद्र बोस की गतिविधियां प्रमुख वजह थीं, जिन्होंने जापान की मदद से इंडियन नेशनल आर्मी का नेतृत्व संभाल लिया था। आज़ाद हिन्द फौज का गठन करते हुए पूर्वी एशिया में उन्होंने खुद को काफी मजबूत कर लिया था। आज़ाद हिन्द फौज़ की सफलता ने कांग्रेस नेतृत्व को बेचैन कर दिया था।

सुभाष चंद्र बोस
अंग्रेजों ने सुभाष को ‘फासीवादी’ करार दिया
भारतीय राजनीति पर सुभाषचंद्र बोस की अपनी अलग की पकड़ थी। उन दिनों राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर उभरी कांग्रेस भी अंग्रेजों को देश के बाहर करने के लिए आंदोलन चला रहा था। इसके बाद भी दोनों के मतों और तर्क में असामनता की धारा बह रही थी। दोनों ही अपने स्तर पर दूरी पर बनाकर चलते रहे। इसके बीच अंग्रेजों पर सुभाषचंद्र बोस का ख़ौफ था। इसकी कारण सुभाषचंद्र बोस को फासीवादी कहा जाने लगा।

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