रेलवे एक कंडम कोच को न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन के रूप में तैयार कर 22 लाख रुपये की कर रहा बचत

रेलवे यांत्रिक कारखाने के इंजीनियर भारत को आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। कोरोना काल में भी वे कबाड़ से विकास का रास्ता तैयार कर रहे हैं। कंडम हो चुके यात्री ट्रेनों के कोचों को न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन में बदलकर रेलवे ही नहीं देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। गोरखपुर के इंजीनियर अभी तक 73 न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन बना चुके हैं। अक्टूबर तक 30 और वैगन बनाने का लख्य निर्धारित है। इन वैगनों से ऑटोमोबाइल्स की ढुलाई कर रेलवे अच्‍छी कमाई भी कर रहा है।

22 लाख रुपये की बचत कर रहा रेलवे

एक न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन के निर्माण में लगभग 6 लाख रुपये की लागत आती है। जबकि नया वैगन बनाने में रेलवे को करीब 30 लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अगर एक कंडम कोच को कबाड़ में बेचते हैं तो लोहे के भाव से लगभग दो लाख रुपये ही मिलते हैं। ऐसे में रेलवे एक कंडम कोच को न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन के रूप में तैयार कर 22 लाख रुपये की बचत कर रहा है। सिर्फ गोरखपुर के इंजीनयर अभी तक न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन तैयार कर 16 करोड़ की बचत कर चुके हैं।

परंपरागत की तुलना में सुरक्षित और गतिमान हैं न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन

न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन, पुराने (परंपरागत) वैगनों की तुलना में बेहद सुरक्षित और गतिमान हैं। पुराने वैगन जहां अधिकतम 50 से 60 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौडती थीं, वहीं नए वाले की चाल 100 किमी प्रति घंटा है।  पुराने वैगन में दो से तीन कारें आ पाती थीं, नए वैगन में छह कारें समा जाती हैं। अभी तक रेलवे पुराने वैगनों से ही ऑटोमोबाइल्स की ढुलाई करता रहा है। अब जब नए मॉडिफाइड वैगन आ गए हैं तो माल ढुलाई की रफ्तार भी बढ़ गई है। पूर्वोत्तर रेलवे ही नहीं चेन्नई और सूरत से भी देश के कोने-कोने और बांग्लादेश तक  तक नए वैगनों से ऑटोमोबाइल्स की ढुलाई हो रही है।

कम लागत से नए वैगन हो रहे तैयार

इस संबंध में पूर्वोत्‍तर रेलवे के सीपीआरओ पंकज कुमार सिंह का कहना है कि कंडम कोचों और अपने संसाधनों से न्यू मॉडिफाइड गुड्स वैगन बनाए जा रहे हैं। इंजीनियरों के इस प्रयास से कम लागत में नए मॉडिफाइड वैगन तैयार हो रहे हैं। ऑटोमोबाइल्स की ढुलाई और आसान हो गई है। पर्यावरण संरक्षण के साथ अर्थव्यवस्था भी मजबूत हो रही है। 

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