Wednesday , September 20 2017

राष्ट्रपति चुनाव किनारे, मोदी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना ये ऐलान, टूटा अखंड भारत का सपना  

राष्ट्रपति चुनाव किनारेनई दिल्ली। राष्ट्रपति चुनाव के लिए मतदान अभी पूरे ही हुए थे कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एक नई मुसीबत खड़ी हो गई। कर्नाटक में जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की जा रही है।

इसके लिए राज्य ने नए झंडे का न केवल प्रारूप तय कर लिया है, बल्कि इसके डिजाइन को तैयार करने के लिए नौ सदस्यों की एक कमेटी भी बनाई जा चुकी है।

इससे पहले भी कर्नाटक डे मनाए जाने के दौरान भी अलग प्रकार का झंडा देखा जाता रहा है। बता दें अलग झंडे को अनुमति दिए जाने का अर्थ राष्ट्रध्वज की अहमियत ख़त्म माना जा रहा है। लोगों का यह भी कहना है कि यदि ऐसा हुआ तो वाकई में यहां से ‘भारत का विनाश’ शुरू हो जाएगा।

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ख़बरों के मुताबिक़ कर्नाटक में कांग्रेस के नेतृत्व सिद्धारमैया वाली सरकार ने 9 लोगों की एक कमेटी तैयार की है जो झंडे का डिजाइन तैयार करेगी।

इसके अलावा इस कमेटी को नए झंडे के लिए कानूनी दांवपेच की रिपोर्ट भी सौंपनी होगी। बता दें कि अभी तक सिर्फ जम्मू-कश्मीर के लिए ही अलग झंडा की अनुमति मिली हुई है।

राज्य में इससे पहले कर्नाटक डे मनाए जाने के दौरान भी अलग प्रकार का झंडा देखा जाता रहा है। वह झंडा पीले और लाल रंग का हुआ करता था। लेकिन अब इस झंडे को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है।

सीएम सिद्धारमैया ने कहा कि क्या देश के संविधान में ऐसा कोई भी नियम है जिसमें राज्य के पास खुद का झंडा होना अपराध बताया गया हो?

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उन्होंने कहा कि इस कदम का चुनाव से कोई लेना देना नहीं है। अगर भाजपा इसके खिलाफ है तो उन्हें खुलकर सामने आना चाहिए।

झंडे की मांग का यह कदम राज्य में अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले देखने को मिला है। हालांकि बता दें कि 2012 में जब राज्य में भाजपा की सरकार थी तब भी अलग झंडे की मांग उठी थी।

लेकिन उस समय राज्य सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट से कहा था कि सरकार लाल और पीले रंग के कन्नड झंडे को आधिकारिक झंडा घोषित नहीं करेगी क्योंकि अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के खिलाफ होगा।

वहीं इसी मामले पर विधानसभा में तत्कालीन मंत्री गोविंद कारजोल ने भी इस बात का समर्थन किया था कि देश में राज्यों को अलग झंडा देना, राष्ट्रीय ध्वज का महत्त्व खत्म करना है।

इससे न केवल लोगों में प्रांतवाद की भावनाएं पैदा होंगी। बल्कि प्रगति के लिए जिस अखंड भारत का सपना युगों-युगों से देखा जाता रहा है, उस पर भी यह पानी फेर देगा।

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