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फिदायीन की तरह खुद में धमाका कर लेती हैं ये जिहादी चीटियां

नई दिल्ली: पूरी दुनिया में आतंकवाद अपनी जड़ें जमा चुका है. शायद ही कोई देश इससे अछूता हो. धर्म के नाम पर लोग जिहाद छेड़ते हैं और फिदायीन बनने तक से नहीं चूकते. अभी तक ये ‘बीमारी’ सिर्फ इंसानों में ही थी लेकिन आज हम आपको ऐसे फिदायीनों के बारे में बताने जा रहे हैं जो इंसान नहीं हैं बल्कि दुनिया के वो नन्हे बादशाह हैं जिनसे इंसान कई मामलों में सीख लेता आया है.

फिदायीन

फिदायीन हैं ये चीटियां

ये खबर जितनी हैरत भरी है उतनी ही रोचक भी. दुनिया को अब ऐसी चीटियों के बारे में पता चला है कि जो शहादत देती हैं. ये चीटियां फ़िदायीन हमलावर की तरह ख़ुद में धमाका कर लेती हैं. फर्क बस इतना है कि आतंकी दुनिया को मिटाने के लिए ऐसा करते हैं मगर ये चीटियां अपनी दुनिया बचाने के लिए ऐसा करती हैं.

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चीटियों का सामाजिक ताना-बाना गज़ब का है. धुन की पक्की चीटियों को उनकी मेहनत की वजह से जाना जाता है. वो ख़ुद काफ़ी छोटी होने के बावजूद अपने से कई गुना ज़्यादा वज़न उठाकर ले जाती हैं. मेहनत का काम करते हुए जहां इंसान कुछ ही घंटों में थक कर चूर हो जाता है वहीं चीटियां कई दिनों तक लगातार काम करती हैं वो भी बिना थके.

जर्नल ज़ूकीज़ में छपी एक स्टडी में बताया गया है कि ब्रुनेई के कुआला बेलालॉन्ग फ़ील्ड स्टडीज़ सेंटर के सामने पेड़ों के क़रीब चीटियों के ऐसे कई घर हैं, जो अपने घर पर हमला होने की सूरत में अपनी जान देने से भी पीछे नहीं हटतीं.

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इन चीटियों में धमाका करने की ख़ास प्रवृति होती हैं. इसे कोलोबोपसिस एक्सप्लोडेंस कहा जाता है. जब इनके घोंसलों पर हमला या अतिक्रमण किया जाता है तो वो अपने पेट में धमाका कर लेती हैं. ऐसा करते ही उनके पेट से चिपचिपा, चमकीला, पीला तरल निकलता है, जो बेहद ज़हरीला होता है.

ये ठीक उसी तरह है जैसे मधुमक्खी डंक मारने के बाद दम तोड़ देती है. लेकिन उनकी ये शहादत उनके घोसलों को बचा लेती है.

इनके बारे में पहली बार 1916 में एक लेख लिखा गया था. हालांकि वैज्ञानिक इन्हें करीब दो सौ साल से ज़्यादा वक़्त से जानते हैं.

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