न कोई देवी न मूर्ति फिर भी देश-विदेश से लाखों लोग आते हैं इस अनोखे मंदिर में, जानें ऐसा क्यों…

नई दिल्ली। क्या आपने कभी किसी ऐसे मंदिर की कल्पना की है जिसमे किसी देवी देवता की मूर्ति ना हो और उस मंदिर में सभी धर्म समुदाय और देश विदेश के लोग आते हों। जी हाँ धर्म की नगरी काशी में है एक ऐसा मंदिर जिसे धर्म से कोई सरोकार नहीं बल्कि सरोकार है तो अखंडता में एकता का।

ये मंदिर विश्व का इकलौता मंदिर है जिसे संगमरमर के पत्थरों से तराश कर बनाया गया था और जिसका उद्घाटन स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने किया था।

भारत माता मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शब्द थे- ‘इस मंदिर में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। यहां संगमरमर पर उभरा हुआ भारत का मानचित्र भर है।

मुझे आशा है कि यह मंदिर सभी धर्मों, हरिजनों समेत सभी जातियों और विश्वासों के लोगों के लिए एक सार्वदेशिक मंच का रूप ग्रहण कर लेगा और इस देश में पारस्परिक धार्मिक एकता, शांति तथा प्रेम की भावनाओं को बढ़ाने में बड़ा योग देगा।

इस तीर्थ का उद्घाटन करते हुए मेरे मन में जो भावनाएं उमड़ रही हैं, उनको मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूं।’ प्राचीन नगरी काशी मंदिरों का नगर है। यहां की गलियों में असंख्य मंदिर स्थापित हैं।

मंदिर ही क्यों, यहां तो मस्जिद, गि‍रजाघर और गुरुद्वारे भी अनेक हैं, पर इन पूजा स्थलों की भीड़ से बिलकुल अलग एक निराला मंदिर- भारत माता का मंदिर शहर के इंगलिशिया लाइन और सिगरा चौराहे के बीच स्थित है। शायद यही वजह है की धर्म की नगरी काशी को यह मंदिर एक अलग और अलौकिक पहचान देता है।

यह मंदिर 1918 में निर्माण शुरू हुआ और 1924 में पूर्ण हुआ ऐसे में लगभग 6 वर्ष में तैयार हुआ यह मंदिर अपने कारीगरी के लिए विख्यात है।इस मंदिर के इंजिनियर बाबू दुर्गा प्रसाद खत्री हैं।

इस मानचित्रानुमा मूर्ति को बनाने में 30 मजदूर और भवन को बनाने में मात्र 25 मजदूरों ने अपनी कारीगरी पेश की। बनाने में 25 अक्टूबर वर्ष 1936 में स्थापित यह मंदिर अपनी विशिष्टताओं के कारण आज विभिन्न धर्मावलंबी असंख्य भारतीयों की ‘श्रद्धा का मंदिर’ बन चुका है।

अंग्रेजों की अधीनता में दबे भारतीयों ने इस भव्य और अनूठे मंदिर की परिकल्पना की और उन दिनों करीब 10 लाख रुपए की लागत से काशी के रईस राष्ट्ररत्न शिवप्रसाद गुप्त ने इसका निर्माण कराया। इस मंदिर के निर्माण में 762 मकराना पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है।

इस्तेमाल एक पत्थर की लम्बाई चौड़ाई 11 गुने 11इंच है। 1 इंच में 2000 फ़ीट पहाड़ों की ऊंचाई और समुद्र की गहराई को दर्शाया गया है जबकि 1 इंच में 6 .4 मील लम्बाई और 1 इंच में 9. 5 किमी लम्बाई दर्शाया गया है।

इस मानचित्र में 450 पर्वत श्रृंखलाओंको दर्शाया गया है और साथ में 2 बड़ी नदियों समेत 800 छोटी नदियों को दर्शाया गया है। इसके उद्घाटन के समय सरदार बल्लभ भाई पटेल ,अब्दुल गफ्फार खान और डॉ भगवन दस जी आये हुए थे।

इस मंदिर के निर्माण के पीछे का उद्देश्य सभी धर्मों और समुदायों को एकता के सूत्र में पिरोना था क्योंकि उन्नीसवीं सदी के शुरुआत में जाति और धर्म के नाम पर मतभेदों का दौर चल रहा था ऐसे में शिव प्रसाद गुप्त ने इस मंदिर के निर्माण की परिकल्पना की और गाँधी जी ने इसका उद्घाटन किया।

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आज ये मंदिर पुर विश्व में अपनी कला और संस्कृति के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शायद यही वजह है कि देश विदेश से लोग यहाँ भारत माता के दर्शन मात्र को आते हैं।

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