दिलदार : ऑटो ड्राईवर ने लावारिस बच्ची के साथ किया वो, जिसे जानकार हैरान रह जायेंगे आप !…  

29 साल का बाबू मुद्रप्पा रोज़ की तरह उठा. तैयार हुआ. अपनी ऑटो स्टार्ट की और काम पर निकल पड़ा. बेंगुलुरु की सड़कों पर वो सवारी ढूंढ रहा था.जैसे ही वो वाइटफील्ड रोड पहुंचा, उसे किसी के चिल्लाने की आवाज़ आई.

आवाज़ किसी महिला की लग रही थी. इसलिए बाबू वहीं रुक गया. उसने देखा कि एक औरत को सड़क पर दर्द से तड़प रही थी. वो प्रेगनेंट थी और उसे लेबर पेन हो रहा था.बाबू से उस औरत की हालत देखी नहीं गई. उसने उसे ऑटो में बैठाया और पास के ही अस्पताल में ले गया. पर जब अस्पताल पहुंचा तो उसे डॉक्टरों सीवी रमन अस्पताल जाने को कहा.

प्रेगनेंट महिला दर्द से बुरी तरह तड़प रही थी. इसलिए बाबू ने उससे कोई सवाल नहीं पूछा. अस्पतालवालों ने जो भी फॉर्म दिए, उसने चुपचाप भर दिए. फॉर्म भरने के दौरान उसे पता चला कि महिला का नाम नंदिता था. इसके अलावा उसे और कोई जानकारी नहीं मिली.

कुछ घंटों बाद नंदिता ने एक बेटी को जन्म दिया. पर वो दो महीने प्रीमैच्योर पैदा हुई थी. उसका वज़न भी सिर्फ़ 850 ग्राम था. बच्ची की हालत ख़राब थी. अस्पतालवालों ने उसे बोव्रिंग हॉस्पिटल ले जाने को कहा. ताकि उसका सही इलाज हो सके.

बाबू नवजात बच्ची को लेकर वहां भागा. उसे अस्पताल में एडमिट करवाने के बाद वो वापस सीवी रमन हॉस्पिटल पहुंचा. उसे बाकी पेपरवर्क पूरा करना था. पर जब वो वहां पहुंचा तो पता चला नंदिता वहां से भाग गई थी.

जब बाबू को ये बात पता चली तो उसे नवजात बच्ची के लिए बुरा लगा. इस हद तक कि उसने फ़ैसला किया किया वो बच्ची को अडॉप्ट कर लेगा. उसे अपनी बेटी की तरह पालेगा. बाबू पहले से शादीशुदा था. उसके ख़ुद के दो बच्चे थे.

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बाबू ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा:

“जब मैंने उस बच्ची को देखा तो मुझे अपने बच्चे याद आ गए. इसलिए मैं उसे अकेला छोड़ नहीं पाया. मैंने उसे अपने साथ रखने का फ़ैसला किया. साथ ही अस्पताल और बाकी का ख़र्च भी उठाया.”

क्योंकि बच्ची की हालत अभी भी नाज़ुक थी, इसलिए उसे अस्पताल में भी रखा गया था. बाबू दिन में ऑटो चलाता और रात में बच्ची को देखने अस्पताल जाता. शुरुआत में बच्ची को सांस की दिक्कत थी. पर धीरे-धीरे उसकी हालत सुधरने लगी थी.

बाबू ने बच्ची के खाने से लेकर दवाइयों तक का पूरा खर्च उठाया और उसका ख्याल रखा. उसने वो सब किया जो एक पिता अपनी नवजात बेटी के लिए करता है. अस्पतालवालों की भी सारी बातें मानीं. पर 18वें दिन बच्ची की हालत बहुत ख़राब हो गई और डॉक्टर उसे बचा नहीं पाए.

जब बाबू से पूछा गया कि उसने अस्पताल में कितना ख़र्चा किया वो उसने रकम बताने से साफ़ मना कर दिया.

 

उसने कहा:

“मैंने जो पैसे और वक़्त बच्ची के साथ बिताया उसको गिना नहीं जा सकता. वो मेरी बच्ची जैसी थी. कोई भी इंसान इस बात का हिसाब नहीं रखता कि उसने अपने बच्चों के खाने और अस्पताल पर कितना ख़र्चा किया.”

जहां एक तरफ़ हर दिन हम रेप, मर्डर, टेररिस्ट अटैक, और दिल दुखाने वाली ख़बरें पढ़ते हैं. अपने आसपास देखते हैं. वहीं दूसरी तरह बाबू जैसे लोग इंसानियत पर हमारे भरोसे को और मजबूत करते हैं.

 

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