जानिए क्या होते हैं पेरेंटिंग चैलेंजिज, और जॉब के साथ कैसे रखें पार्टनर और बच्चे को खुश…

अगर महिला वर्किंग हो तो पार्टनर, पेरेंटिंग और जॉब के बीच संतुलन बनाए रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। आजकल आप चाहे किसी भी फील्ड में जॉब करें, कॉम्पिटिशन हर जगह होता है। नौ से शाम 6 बजे तक की जॉब करने के बाद पार्टनर और बच्चों के साथ क्वॉलिटी टाइम बिताना किसी चैलेंस से कम नहीं होता है। लड़की चाहे कितनी भी मॉर्डन क्यों न हो जाए वह हर स्थिति में चाहती है कि उसका पति सिर्फ उससे प्यार करें और उसके बच्चे हमेशा स्वस्थ और खुश रहें। परवरिश संबंधी कई मुद्दों पर पति-पत्नी एकमत नहीं होते हैं। लेकिन कुछ तरीके ऐसे हैं जो अगर आपने सीख लिए तो ये काम आपके लिए बहुत आसान हो जाएगा।

जानिए क्या होते हैं पेरेंटिंग चैलेंजिज, और जॉब के साथ कैसे रखें पार्टनर और बच्चे को खुश...

क्या होते हैं पेरेंटिंग चैलेंजिज

कहते हैं कि ईश्वर सबके पास नहीं रह सकता, इसलिए उसने माता-पिता को भेजा। हर माता-पिता की ख्वाहिश होती है कि उसकी संतान खुश रहे, तरक्की करे और उसे वह सब मिले, जिसकी उसे चाह हो। इसके लिए वे संतान को बेहतर परवरिश देना चाहते हैं। कई बार पेरेंटिंग के तौर-तरीके को लेकर उनमें मतभेद होता है। मतभेद बढ़ता है तो रिश्ते में तनाव पैदा होता है। जानते हैं ऐसे ही कुछ पेरेंटिंग मुद्दों के बारे में, जिनसे कपल्स के रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं।

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टाइम को ऐसे करें मैनेज

जैसे ही किसी दंपती के जीवन में बच्चा आता है, पूरा घर उसी के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। बच्चा एक तरह से वैवाहिक जीवन को पूर्ण करता है, वह अनजाने में ही जीने का मकसद देता है और लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाता है। यहां तक सब कुछ सुंदर प्रतीत होता है लेकिन इस नए मेहमान को माता-पिता का भरपूर समय और ध्यान भी चाहिए। जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, अटेंशन सीकिंग होने लगता है और माता-पिता का ध्यान इसी पर केेंद्रित हो जाता है कि कहीं वह गिर न जाए, खुद को चोट न पहुंचा ले। महानगरों में नौकरीपेशा एकल परिवारों के पास समय का अभाव है, इस वजह से कई बार बच्चे को समय देने या कपल टाइम को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद होने लगता है। कई बार विवाद इतना बढ़ता है कि रिश्ते में दरार पैदा हो जाती है। ऐसी स्थितियों में समझदारी की जरूरत है।

टाइम मैनेजमेंट के लिए क्या करें

टाइम मैनेजमेंट कुछ इस तरह करें कि बच्चे और पार्टनर दोनों को समय दे सकें। वीक डेज पर समय न हो तो वीकेंड पर खुद को फ्री करें। यह समय बच्चे और फैमिली के लिए हो। महीने में एक-दो बार पार्टनर के साथ समय बिताएं। माता-पिता, रिश्तेदार या एक्सटेंडेड फैमिली आसपास हो तो बच्चे को उनके पास छोड़ें और कपल टाइम एंजॉय करें।

क्या होना चाहिए पेरेंटिंग स्टाइल?

हर व्यक्ति के विचार, सोच या भावनाएं अलग होती हैं, पति-पत्नी भी एक जैसा नहीं सोच सकते। पेरेंटल स्टाइल भी अलग हो सकता है। कई अभिभावक अनुशासन पसंद होते हैं तो कुछ बच्चों के साथ दोस्ताना ढंग से रहते हैं।  कुछ लोग सख्त-मिजाज होते हैं तो कुछ उदार मन के। कई बार हजबैंड को वाइफ का बच्चे के प्रति जयादा पजेसिव होना अखरता है तो पत्नी को पति के लाड़-प्यार से परेशानी हो सकती है। दोनों अपने विचारों, अनुभवों और ज्ञान के आधार पर पेरेंटिंग रूल्स बनाते हैं। कोई भी पेरेंटिंग स्टाइल गलत नहीं होता क्योंकि मूल भावना संतान की बेहतरी होती है। फिर भी इसे लेकर दोनों के बीच कई बार तनातनी की स्थिति पैदा हो जाती है।

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अच्छी पेरेंटिंग के लिए करें ये काम

बच्चे के भविष्य को देखते हुए संयुक्त रूप से पेरेंटल स्टाइल डेवलप करने की जरूरत होती है। इसलिए बच्चे के भविष्य से जुड़ी इच्छाओं-अपेक्षाओं के बारे में आपस में बात करें और पेरेंटिंग रूल्स सुनिश्चित करें। जो आदतें या अनुशासन संबंधी नियम बच्चे के लिए निर्धारित कर रहे हैं, उनका स्वयं भी पालन करें।

एक-दूसरे को टोकना छोड़ें

कई बार एक पार्टनर को दूसरे की बात पसंद नहीं आती तो वह बच्चे के सामने ही अपने जीवनसाथी को टोकने या डांटने लगता है। इससे बच्चे पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जब उसे लगता है कि पापा मां को डांटते रहते हैं तो वह खुद भी मां को फॉरग्रांटेड लेने लगता है। अगर पेरेंटिंग को लेकर पार्टनर के रवैये या विचार से असहमत हैं तो उसे बच्चे के सामने डांटने या टोकने से बेहतर है कि अकेले में बात करें। यह जरूर तय करें कि बच्चे के सामने कैसे व्यवहार करना है। बच्चे के सामने न तो जीवनसाथी से ऊंची आवाज में बात करें, न उसे टोकेें या आलोचना करें।

जिम्मेदारियों का करें बंटवारा

भले ही आज स्त्रियां घर से बाहर निकल कर काम कर रही हैं, मगर घरेलू कार्य आज भी आमतौर पर उन्हीं की जिम्मेदारी समझे जाते हैं। ऑफिस और घर के बीच सामंजस्य बिठाना स्त्री के लिए मुश्किल हो जाता है, जिसका नतीजा होता है, चिड़चिड़ापन, $गुस्सा और कुंठा। ऐसी स्थितियों में आपसी रिश्ते प्रभावित होने लगते हैं। अत्यधिक थकान या दबाव में क्रोध आना स्वाभाविक है। इसलिए घरेलू कार्यों में पति को हाथ बंटाना चाहिए। पत्नी किचन संभाल रही है तो पति कोई अन्य काम संभाले। इससे बच्चों को भी घरेलू कार्यों का महत्व समझ आएगा और उनमें जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।

ब्लेम गेम

कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं होता, उसके निर्णय हमेशा सही नहीं होते, भले ही वे करियर के संबंध में लिए जाएं या परवरिश के लिए। अगर बच्चे के लिए लिया गया कोई फैसला सही न रहा हो तो पार्टनर को ताने मारने से अच्छा है कि आगे बढ़ें और सही $फैसले लें। ब्लेम गेम से स्थिति बिगड़ती है। किसी को दोषी बनाने से पहले स्थितियों का आकलन करें। किन स्थितियों में फैसला लिया गया और तब से स्थितियां कितनी बदलीं, ऐसे हर पहलू पर सोचें। अगर कोई फैसला गलत रहा हो तो इस बात पर विचार करें कि आगे उसे कैसे सही किया जा सकता है।

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बेडटाइम फाइट

भारतीय घरों में प्राइवेसी का कॉन्सेप्ट अभी उतना नहीं है। बच्चा आमतौर पर माता-पिता के साथ सोता है क्योंकि उसे दोनों के स्पर्श की जरूरत होती है। छोटे बच्चे के साथ कई बार जागना पड़ता है। बड़ा होने पर भी वह माता-पिता के साथ सोना चाहता है, जिससे पति-पत्नी को एक-दूसरे के लिए समय नहीं मिल पाता। इससे समस्याएं हो सकती हैं। एक उम्र के बाद बच्चों को अलग सोने के लिए प्रेरित करें। शुरुआत में बच्चे का बेड अपने बेडरूम में ही लगाएं। सोते समय उनके साथ रहें। घर में नानी-दादी हैं तो बच्चे को उनके पास सुला दें। जब बच्चा चार-पांच साल का हो जाए तो उसके लिए अलग कमरा तैयार करें।

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