क्या शिवजी के त्रिशूल पर टिकी है काशी?

3-1450002884एजेन्सी/वाराणसी। काशी को भगवान शिव की नगरी कहा जाता है। मान्यता है कि काशी भगवान भोलेनाथ के त्रिशूल पर टिकी है। यह कथन बहुत प्राचीन है। आज भी कहा जाता है कि काशी इस पृथ्वी पर नहीं, बल्कि भगवान शिव के त्रिशूल पर स्थित है। वे जटा में जहां गंगा को धारण करते हैं, अपने त्रिशूल पर काशी को स्थान देते हैं।

इस मान्यता का क्या अर्थ है? वास्तव में यहां त्रिशूल और काशी के बीच बहुत निकट के संबंध को बताया गया है। त्रिशूल से भगवान शिव भक्तों को अभय रहने का वरदान देते हैं और इसी से दुष्टों को दंड भी देते हैं।

त्रिशूल पर काशी को धारण करने का अर्थ है- काशी की प्राचीनता, पवित्रता की स्वयं भोलेनाथ रक्षा करते हैं। विभिन्न ग्रंथों में कहा गया है कि काशी में भगवान शिव अखंड वास करते हैं। यह बाबा विश्वनाथ की नगरी है जो संपूर्ण विश्व के नाथ हैं।

मनुष्य के जीवन में तीन तरह के कष्ट माने जाते हैं- दैविक, दैहिक और भौतिक। काशी के कण-कण में भगवान शिव का वास है। यहां शिव के दर्शन करने से ये तीनों ताप दूर होते हैं तथा जीवन में शीतलता का आगमन होता है। शिव के त्रिशूल से इन तीनों का शमन होता है। इसलिए कहा जाता है कि काशी शिव के त्रिशूल पर टिकी है।

इसे मुक्ति की नगरी भी कहा जाता है। मान्यता है कि जो काशी में देहत्याग करता है, शिव उसके कान में मुक्ति का मंत्र फूंकते हैं। प्रश्न है कि वाराणसी को यह नाम क्यों मिला? 

दरअसल यह नाम इसे दो नदियों की वजह से मिला। यहां वरुणा और अस्सी नदियां प्रवाहित होने से दोनों नदियों के नाम को मिलाकर संयुक्त रूप से इस नगरी को वाराणसी कहा जाता है।

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