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मुख्यधारा में शामिल होने के लिए इन आदिवासियों ने चुना एक अलग रास्ता

आदिवासियोंजमशेदपुर। ऊंची जाति के हिंदुओं द्वारा धोखा दिए जाने, विकास की दौड़ में पीछे छोड़ दिए जाने के असंतोष का अहसास अब आदिवासियों में मुठ्ठी से निकले समय की भरपाई करने और शिक्षित होने की इच्छा जगा रहा है।

जमशेदपुर में आदिवासियों के एक अखिल भारतीय सम्मेलन में कई आदिवासियों ने बड़े पैमाने पर फैली हीनभावना को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए शिक्षा की जरूरत की बात कही।

झारखंड की ‘हो’ जनजाति के आदिवासी अधिकार अभियानकर्ता थाल्को मांझी ने टाटा द्वारा आयोजित आदिवासी सम्मेलन ‘संवाद’ में एक बुक स्टॉल लगाया था।

मांझी ने कहा कि सवर्ण हिंदुओं ने आदिवासियों को चिरकाल तक अपने अधीन रखने के लिए भगवान को अपना भरोसेमंद सहयोगी बना लिया था।

मांझी ने ईश्वर के अस्तित्व के बारे में अपनी जीवनर्पयत दुविधा का जिक्र किया, जिसका 2012 तक वे सही व्याख्या के अभाव में कभी वर्णन नहीं कर पाए।

मांझी ने याद करते हुए कहा, “उस साल मैं अखिल भारतीय मूल निवासी बहुजन समाज केंद्रीय संघ ( एआईएमबीएससीएस) के शिशिर वर्जे के संपर्क में आया था। मैंने नागपुर में उनके आठ दिवसीय शिविर में हिस्सा लिया था।”

उन्होंने कहा, “उन्होंने मुझ जैसे लोगों को सही प्रकार से तर्क करना सिखाया, हमें वर्ण व्यवस्था यानी हिंदू जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में बताया जो पहले हम कभी नहीं जान पाए थे।”

उन्होंने कहा, “यह सब आत्मा-वात्मा झूठ है। हिंदुओं ने हमें धोखा दिया है। मैं हमेशा सोचता था कि ईश्वर अगर इतना दयालु है तो वह समाज में इतनी असमानता क्यों होने देता है? ईश्वर एक भ्रम है।”

मांझी ने कहा कि जब तक वह भीम राव अंबेडकर की शिक्षा के बारे में नहीं जानते थे, तब तक उन्हें हिंदू धर्म की शोषण करने वाली प्रणाली के बारे में कुछ भी पता नहीं था, जिसने परिष्कृत प्रचार के माध्यम से संभवत: हर भारतीय की संस्कृति में गहरी पैठ बना ली है।

मांझी ने आदिवासी सम्मेलन में दलित आदिवासी साहित्य के स्टॉल पर जहां ‘शूद्रों की खोज’ और ‘हिंदू नहीं आदिवासी’ जैसे शीर्षकों वाली किताबें थीं, कहा, “और जब उन्हें बौद्धों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा तो उन्होंने उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया।”

मांझी ने कहा, “मैं आदिवासियों को ईश्वर जैसी कपोल कल्पना वाली चीजों पर ध्यान न देने और लंबे अनुष्ठानों पर समय बर्बाद न करने को कहता हूं। हमें अपने खोए समय की भरपाई करनी है।”

मांझी ने रोष प्रकट करते हुए कहा कि जिन लोगों को आरक्षण प्रणाली का लाभ मिलता है वे भी यह सौभाग्य खुद तक ही सीमित रखते हैं और अन्य लोगों को शिक्षित नहीं करते।

एआईएमबीएससीएस अम्बेडकर, बिरसा मुंडा और ऐसी ही अन्य प्रगतिशील हस्तियों की विचारधारा को प्रसारित करने के लिए बनाया गया है।

हो जनजाति की सुखमति का भी सम्मेलन में एक बुक स्टॉल था। उन्होंने भी मांझी की तरह नागपुर में आठ दिवसीय एआईएमबीएससीएस कार्यशाला में हिस्सा लिया था।

सुखमति ने कहा, “मैं केवल यही चाहती हूं कि मेरी भावी पीढ़ी शिक्षित हो। मुझे लगता है कि उनकी हीन भावना को दूर करने का यही सबसे अच्छा तरीका है। अन्यथा वे केवल पीते ही रहेंगे, जैसा कि वे बरसों से करते आ रहे हैं।”

झारखंड में अन्य जनजातियों के अलावा तीन प्रमुख जनजातियां हैं – हो, संथाल और मुंडा। हालांकि अब मुंडा जनजाति मुख्य धारा में शामिल हो चुकी है, लेकिन अन्य दो अभी भी पिछड़ी हुई हैं और उनके कई युवा बेरोजगार हैं।

जनजातीय स्वास्थ्य प्रणाली पर आधारित आदिवासी सम्मेलन का तीसरा संस्करण नवंबर 15-19 से आयोजित किया गया था। पूरे देश में करीब 6 करोड़ आदिवासी हैं।

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