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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पुलिस पूछताछ के दौरान हर समय वकील की मौजूदगी अनिवार्य नहीं

देश की सर्वोच्च अदालत ने आपराधिक न्याय प्रणाली और पुलिस पूछताछ से जुड़े मामलों में एक बेहद अहम और स्पष्ट फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 38 के तहत किसी गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुलिस पूछताछ के प्रत्येक सत्र (Session) के दौरान वकील की लगातार ‘फिजिकल’ मौजूदगी अनिवार्य हो।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा?

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कानून की व्याख्या करते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट कीं:

  • वकील से मिलने का अधिकार: BNSS की धारा 38 के तहत प्रावधान को सीधे तौर पर पढ़ने से यह साफ होता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है।
  • लगातार मौजूदगी की बाध्यता नहीं: यह कानून किसी भी तरह से, हर पूछताछ सेशन के दौरान वकील की लगातार शारीरिक (फिजिकल) मौजूदगी की वकालत नहीं करता है, फिर चाहे वह देखने या सुनने की दूरी पर ही क्यों न हो।
  • पूछताछ में न आए बाधा: अदालत ने स्पष्ट किया कि हालांकि हिरासत में आरोपी के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन इसकी शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिए जो कस्टोडियल इन्वेस्टिगेशन (हिरासत में पूछताछ) के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर दें या पुलिस की जांच में अड़चन पैदा करें।

फैसले का क्या होगा असर?

कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से एक बड़ा भ्रम दूर हो गया है और इसके दूरगामी परिणाम होंगे:

  • जांच एजेंसियों को राहत: इस स्पष्टीकरण से जांच एजेंसियों को पूछताछ के दौरान आने वाली व्यावहारिक अड़चनों से राहत मिलेगी और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर चल रही असमंजस की स्थिति खत्म होगी।
  • पारदर्शिता और अधिकार: इससे पुलिस और जांच एजेंसियों को पूछताछ के दौरान पारदर्शिता बनाए रखने में मदद मिलेगी, वहीं दूसरी ओर आरोपियों के कानूनी अधिकारों का दायरा भी स्पष्ट रूप से तय कर दिया गया है।
  • मील का पत्थर: अदालत का यह फैसला देश भर की अदालतों और पुलिस इन्वेस्टिगेशन के लिहाज से एक नजीर साबित होगा, जिससे भविष्य में पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी को लेकर बेवजह के विवाद नहीं होंगे।

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