
1948 में पाकिस्तान ने जब कश्मीर के एक हिस्से पर कब्जा किया तो उसके बाद से 1965 और 1971 में जंग हो चुकी है. और 1999 में कारगिर का संघर्ष भी लगभग जंग के बराबर ही रहा. लेकिन इन सभी सैन्य संघर्षों में भारत का भौगोलिक स्तर पर कुछ हासिल नहीं हुआ. न तो कश्मीर का कब्जे वाला हिस्सा हम ले पाए और न ही कश्मीर में हस्तक्षेप से उसके दावे का खत्म कर पाए. तो सवाल यह है कि क्या एक निर्णायक जंग की जरूरत और है ? और यदि यह जंग होगी, तो इसका अंजाम क्या होगा ?
1965, 1971 और 1999 के युद्ध में पाकिस्तान को भारत ने आसानी से धूल चटा दी थी, लेकिन पिछले 17-18 वर्षों में भारत और पाकिस्तान की सैन्य शक्ति में काफी बदलाव आए हैं. जिन्हें समझना जरूरी है. ‘ड्रैगन ऑन आर डोरस्टेप’ किताब के लेख प्रवीण शाहने और गजाला वहाब का तर्क है कि भारत पाक को युद्ध में हरा नहीं सकता. यह किताब भारतीय सेना की कमजोरियों को सामने रखती है.
किताब में कहा गया है कि मोदी के शासन के बावजूद भी भारत पाकिस्तान को युद्ध में हरा नहीं सकता. पाकिस्तान के पास मिलिट्री पावर है तो वहीं भारत के पास मिलिट्री फोर्स है. शाहने और वहाब का तर्क है कि सैनिकों की भर्ती से, युद्ध सामग्री और बाकी साजो सामान जुटाकर भारत में एक बड़ी मिलिट्री फोर्स तैयार की है. लेकिन किसी युद्ध को जीतना के लिए इतना ही काफी नहीं है.
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युद्ध जीतने के लिए जरूरी है मौजूदा सैन्य शक्ति का सही तरीके से उपयोग, युद्ध की प्रकृति से निपटने की ताकत और किसी खास युद्ध के क्षेत्र में लड़ने का कौशल. और सबसे हम है चुनौतियों के दौरान कड़े फैसले समय पर लेने की ताकत. यह सब मिलकर बनता है मिलिट्री पावर, जो फिलहाल पाकिस्तान के पास भारत के मुकाबले ज्यादा है.