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भारत के सात स्‍थान जहां दूसरी दुनिया का राज, जब भी लोगों ने देखा हुआ ‘एलियंस’ पर यकीन

एलियननई दिल्‍ली। धरती पर इंसान के सिवा कोई और भी रहता है, इस बात पर कई बार लोगों ने सवाल उठाए। जिसपर चर्चा हुई और कई लोगों ने ये दावे सच ठहराए। पूरे विश्‍व में दूसरी दुनिया के जन-जीवन पर रिसर्च चल रही है। वैज्ञानिक और विशेषज्ञ अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं कि उन्‍हें पता चल सके कि अपने ग्रह को छोड़कर क्‍या किसी और भी ग्रह पर जीवन संभव है।

एलियंस और उनकी उड़न तस्‍तरी पर आधारित कई फिल्‍में भी बनाई गई हैं। जिससे लोगों के जहन में कल्‍पना ने वास्‍तविकता का रूप लिया। लोगों ने उन बातों पर गौर करना शुरू कर दिया जो एलियंस में होती है।

विश्‍व में एलियंस के आने के तो बहुत से स्‍थान बताए गए हैं, लेकिन हर इंसान वहां जाने की नहीं सोच सकता। इसलिए बेहतर होगा कि आप भारत के वो स्‍थान जान लें, जहां एलियंस के होने और आने का दावा किया गया है।

एलियन

जानिए भारत के वो सात स्‍थान जहां आते हैं एलियंस  

1.सबसे बड़ा दावा कि हिमालय में रहते हैं एलियंस :  विश्वभर के वैज्ञानिक मानते हैं कि धरती पर कुछ जगहों पर छुपकर रहते हैं दूसरे ग्रह के लोग। उन जगहों में से एक हिमालय है। भारतीय सेना (indian army) और वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार नहीं करते लेकिन वे अस्वीकार भी नहीं करते हैं। हिस्ट्री चैनल्स (history channel) की एक सीरिज में इसका खुलासा किया गया।

भारतीय सेना और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की यूनिटों ने सन् 2010 में जम्मू और कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र में उड़ने वाली अनजान वस्तुओं (यूएफओ) के देखे जाने की खबर दी थी, लेकिन बाद में इस खबर को दबा दिया गया। इससे जुड़ी कई घटनाएं हैं जो अलग-अलग समय पर घटित हुईं। सभी घटनाएं न जानकर आप वो स्‍थान जानें, जहां ये घटनाएं हुई हैं। क्‍योंकि आप जाकर वहां की सच्‍चाई को और अच्‍छी तरह समझ सकते हैं।

2.ओडिशा में एलियन के साक्ष्‍य : इस बात का पता एक ताड़पत्र की खुदाई से चला है। वर्ष 1947 में भारत के आजाद होने से कुछ माह पहले ही एक यूएफओ को ओडिशा के नयागढ़ जिला में उतरते देखे जाने की बात कही गई थी। एक स्थानीय कलाकार पचानन मोहरना ने इस घटना को ताड़पत्र पर खुदाई कर दर्ज किया था। पचानन ने उन एलियन व उनके विमान के रेखाचित्र भी बनाए थे। यह यूएफओ 31 मई 1947 को पहाड़ी इलाके नयागढ़ में उतरे थे। इस घटना के एक माह बाद ही न्यू मैक्सिको के पास एक संदिग्ध दुर्घटना हुई थी।

इसके बाद अमेरिकी वायुसेना ने दुर्घटनास्थल से एक उडनतश्तरी को बरामद करने का दावा किया था। हालांकि इस घटना को बाद में अमेरिका और भारत ने छिपाने का प्रयास किया।

3.नर्मदा में सैर-सपाटा करने आते थे एलियन : 1300 किलोमीटर का सफर तय करके अमरकंटक से निकलकर नर्मदा विंध्य और सतपुड़ा के बीच से होकर भडूच (भरुच) के पास खंभात की खाड़ी में अरब सागर से जा मिलती है। नर्मदा घाटी को विश्व की सबसे प्राचीन घाटियों में गिना जाता है। यहां भीमबैठका, भेड़ाघाट, नेमावर, हरदा, ओंकारेश्वर, महेश्वर, होशंगाबाद, बावनगजा, अंगारेश्वर, शुलपाणी आदि नर्मदा तट के प्राचीन स्थान हैं। नर्मदा घाटी में डायनासोर के अंडे भी पाए गए हैं और यहां कई विशालकाय प्रजातियों के कंकाल भी मिले हैं।

माना जाता है कि भीमबैठका के शैलचित्र करीब 35 हजार वर्ष पुराने हैं। इन शैलचित्रों ने शोध की नई और व्यापक संभावनाओं को जन्म (birth) दिया है। इनका मिलान विश्वल के अनेक स्थानों पर मिले शैलचित्रों से भी किया जा रहा है। अनुमान है कि दूसरे ग्रहों के प्राणियों का नर्मदा घाटी के प्रागैतिहासिक मानव से कुछ न कुछ संबंध जरूर रहा है।

यह संबंध किस प्रकार का था इस पर शोध जारी है। पुरासंपदा का खजाना कुछ दशक पूर्व जियोलॉजिस्ट डॉ. अरुण सोनकिया ने नर्मदा घाटी के हथनौरा गांव से अतिप्राचीन मानव कपाल खोजा था। उसकी कार्बन आयु वैज्ञानिकों ने साढ़े तीन लाख वर्ष बताई है। नर्मदा घाटी का क्षेत्र कई पुरासंपदाओं का खजाना माना जाता है।

4.बस्तर में एलियन : छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में एक गुफा में 10 हजार वर्ष पुराने शैलचित्र मिले हैं। नासा और भारतीय आर्कियोलॉजिकल की इस खोज ने भारत में एलियंस के रहने की बात पुख्ता कर दी है।

यहां मिले शैलचित्रों में स्पष्ट रूप से एक उड़नतश्तरी बनी हुई है। साथ ही इस तश्तरी से निकलने वाले एलियंस का चित्र भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है, जो आम मानव को एक अजीब छड़ी द्वारा निर्देश दे रहा है। इस एलियंस ने अपने सिर पर हेलमेट जैसा भी कुछ पहन रखा है जिस पर कुछ एंटीना लगे हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि 10 हजार वर्ष पूर्व बनाए गए ये चित्र स्पष्ट करते हैं कि यहां एलियन आए थे, जो तकनीकी मामले में हमसे कम से कम 10 हजार वर्ष आगे हैं ही।

5.अजंता-एलोरा में एलियन : माना जाता है कि एलोरा की गुफाओं के अंदर नीचे एलियंस का एक सीक्रेट शहर है। यह हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म का प्रमुख स्थल है। यहां की जांच-पड़ताल करने के बाद पता चलता है कि यहां पर एलियंस के रहने के लिए एक अंडरग्राउंड स्थान बनाया गया था।

आर्कियोलॉजिकल और जियोलॉजिस्ट की रिसर्च से यह पता चला कि ये कोई सामान्य गुफाएं नहीं हैं। इन गुफाओं को कोई आम इंसान या आज की आधुनिक तकनीक नहीं बना सकती। यहां एक ऐसी सुरंग है, जो इसे अंडरग्राउंड शहर में ले जाती है।

6.महाबलीपुरम (केरल) में एलियन : केरल का महाबलीपुरम शहर बहुत ही प्राचीन शहर है। यहां के अब तक ज्ञात सबसे प्राचीन राजा बलि थे। बलि के कारण ही विष्णु को वामन अवतार लेना पड़ा था।

यहां पर एक प्राचीन गणेश मंदिर बना है जिसके शिखर को स्पष्ट रूप से रॉकेट की आकृति का बनाया गया है। इस मंदिर की जांच करने के बाद यहां रेडियो एक्टिविटी मटेरियल्स मिला है। यहां पर एक बहुत ही फरफेक्स होल्स बना है। माना जाता है कि यहीं से रॉकेट लांच किया जाता था।

आईटीबीपी की धुंधली तस्वीरों (faded pictures) के अध्ययन के बाद भारतीय सैन्य अधिकारियों का मानना है कि ये गोले न तो मानवरहित हवाई उपकरण (यूएवी) हैं और न ही ड्रोन या कोई छोटे उपग्रह हैं। ड्रोन पहचान में आ जाता है और इनका अलग रिकॉर्ड रखा जाता है। यह वह नहीं था। सेना ने 2011 जनवरी से अगस्त के बीच 99 चीनी ड्रोन देखे जाने की रिपोर्ट दी है। इनमें 62 पूर्वी सेक्टर के लद्दाख में देखे गए थे और 37 पूर्वी सेक्टर के अरुणाचल प्रदेश (arunachal pradesh) में। इनमें से तीन ड्रोन (drone) लद्दाख में चीन से लगी 365 किमी लंबी भारतीय सीमा में प्रवेश कर गए थे, जहां आईटीबीपी की तैनाती है।

7.लद्दाख में एलियन जिसका ‘एयरफोर्स’ भी है साक्षी : लद्दाख में ऐसे प्रकाश पुंज देखे गए हैं। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और चीन अधिकृत अक्साई चिन के बीच 86,000 वर्ग किमी में फैले लद्दाख में सेना की भारी तैनाती है। इस साल लगातार आईटीबीपी के ऐसे प्रकाश पुंज देखे जाने की खबर से सेना की लेह स्थित 14वीं कोर में हलचल मच गई थी।

जो प्रकाश पुंज आंखों से देखे जा सकते थे, वे रडार की जद में नहीं आ सके। इससे यह साबित हुआ कि इन पुंजों में धातु नहीं है। स्पेक्ट्रम एनालाइजर भी इससे निकलने वाली किसी तरंग को नहीं पकड़ सका। इस उड़ती हुई वस्तु की दिशा में सेना ने एक ड्रोन भी छोड़ा, लेकिन उससे भी कोई फायदा नहीं हुआ। इसे पहचानने में कोई मदद नहीं मिली। ड्रोन अपनी अधिकतम ऊंचाई तक तो पहुंच गया लेकिन उड़ते हुए प्रकाश पुंज का पता नहीं लगा सका।

भारतीय वायुसेना  के पूर्व प्रमुख एयर चीफ मार्शल (सेवानिवृत्त) पीवी नाइक कहते हैं कि हम इसे नजरअंदाज नहीं कर सकते। हमें पता लगाना होगा कि उन्होंने कौन-सी नई तकनीक अपनाई है।

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