प्रेरक- प्रसंग: आत्म स्वरूप के इस अनुभव की पहचान को कहते हैं योग 

मन हमेशा दौड़ता है, कभी जगत के पदार्थों में, कभी चित्त में पडी वासनाओं, इच्छाओं और विकारों में। मन की इसी हलचल को वृत्ति कहते हैं, क्योंकि मन की हलचलें अनेक हैं, इसलिए वृत्तियां भी अनेक हैं। यह दौड़ता हुआ मन कभी भी व्यक्ति को चेतना की गहराइयों में नहीं ले जा पाता, बल्कि जगत में ही उलझाए रखता है।

प्रेरक- प्रसंग

अपने शुद्ध आत्म स्वरूप को जानने के लिए मन और चित्त के स्तर पर हो रही हलचलों को शांत करना जरूरी है, इसी को वृत्ति निरोध कहते हैं। योग साधना चित्त वृत्तियां को ठहराने का उपाए है। इन वृत्तियों के ठहरने से भीतर स्थित आत्म स्वरूप का अनुभव होने लगता है, उसी को योग कहते हैं। अतः चित्तवृत्तियों का निरोध योग है।

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