‘तीन तलाक के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाली महिलाओं की हालत दयनीय’

पश्चिम बंगाल में पैर जमाने की कोशिश कर रही भाजपा ने तीन तलाक विधेयक को अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया है। पार्टी इस विधेयक के जरिए अल्पसंख्यकों के एक वर्ग को लुभाने की कोशिश कर रही है जबकि तीन तलाक के खिलाफ आवाज उठाने वाली महिलाएं अपने गुजारे के लिए संघर्ष कर रही हैं।

लोकसभा चुनाव के लिए हाल ही में जारी घोषणापत्र में भगवा पार्टी ने संकल्प लिया कि अगर वह दोबारा सत्ता में आयी तो फौरी तलाक और निकाह हलाला की प्रथाओं को खत्म करेगी। विपक्ष के कड़े विरोध के कारण भाजपा संसद में इस विधेयक को कानून की शक्ल देने में नाकाम रही।

पार्टी के महिला मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय राहतकर ने कहा कि तीन तलाक विधेयक को पारित करने की नरेंद्र मोदी सरकार की कोशिशें मौजूदा लोकसभा चुनाव में ‘‘भाजपा के लिए निश्चित तौर पर सकारात्मक नतीजे लाएगी।’’

वहीं दूसरी ओर, तीन तलाक के विरोध में आवाज उठाने वाली इशरत जहां, शायरा बानो और अतिया साबरी गरीबी में जिंदगी गुजार रही हैं। उनके पास आय का कोई साधन नहीं है। यही महिलाएं तीन तलाक को खत्म करने के लिए उच्चतम न्यायालय पहुंची थीं।

अदालत ने 2017 में अपने ऐतिहासिक फैसले में इस प्रथा को ‘‘अवैध’’ और ‘‘असंवैधानिक’’ ठहराया था।

इशरत जहां का तलाक अप्रैल 2015 में हुआ था और वह अपने दो बच्चों के साथ पड़ोसी हावड़ा जिले में रह रही है।

उन्होंने पीटीआई-भाषा से कहा, ‘‘मेरे पास बच्चों को स्कूल भेजने के पैसे नहीं हैं। अभी तक मैं वित्तीय सहायता के लिए अपने रिश्तेदारों पर निर्भर हूं।’’

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शायरा बानो और अतिया साबरी के लिए भी कहानी इससे अलग नहीं है। वे भी गरीबी में गुजर बसर कर रही हैं और उन्हें तलाकशुदा पति से कोई मदद नहीं मिली।

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