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अगर खाएंगे चिकन तो असर नहीं करेगी एंटीबायोटिक

चिकनचिकन खाने के शौकीन हैं तो संभल जाएं। जुबां को लजीज लगने वाला चिकन सेहत को बेइंतहा नुकसान पहुंचा रहा है। दरअसल, पॉल्ट्री फार्म मालिक चूजों को जल्दी बड़ा करने के लिए एंटीबायोटिक डोज दे रहे हैं। इससे वे एक महीने में बिक्री के लायक बन जाते हैं, लेकिन चिकन खाने वालों पर इसका बुरा असर पड़ रहा है। एंटीबायोटिक डोज से उनके शरीर में मौजूद बैक्टीरिया की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ रही है और इसी कारण बीमार होने पर दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं।

राजधानी में करीब 40 रजिस्टर्ड पॉल्ट्री फार्म हैं। इसके साथ ही अलग-अलग हिस्सों में 20 से अधिक फार्म अवैध तरीके से चल रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक, हर महीने 40 लाख मुर्गे तैयार होते हैं। इनके जरिए करीब 3000 टन चिकन हर महीने तैयार होता है। चिकन कारोबारियों के मुताबिक, शहर में रोजाना करीब 1 लाख किलो मांस की खपत है।

हर दूसरे दिन देते हैं दवा
माल में पॉल्ट्री फार्म चलाने वाले इस्माइल ने बताया कि पीने के पानी में बच्चों को चूजों को हर दूसरे दिन दवा दी जाती है। इसकी डोज देने से 25 से 28 दिन में चूजे का वजन 1500 से 1800 ग्राम तक हो जाता है। दवा के साइड-इफेक्ट के कारण 10 हजार में 500 चूजे मर भी जाते हैं। पहले यह आंकड़ा 3000 तक था।

डॉक्टर ही देते हैं सलाह
माल के ही किसान हसीब ने बताया कि मुर्गों को बीमारी से बचाने के लिए दवाएं खिलानी पड़ती हैं। उनके मुताबिक, मुर्गों को ओफ्लाक्सॉसिन, सिप्लॉक्स, टेरामाइसिन और नियोमाइसिन देना पड़ता है। यह दवा डॉक्टर ही बताते हैं।

घटेगी प्रतिरोधक क्षमता, बेअसर होगी दवा
एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के कारण चिकन खाने वालों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। केजीएमयू के मेडिसिन डिपार्टमेंट के डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि ज्यादा सेवन करने से बैक्टीरिया एंटीबायोटिक की प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेता है। ऐसे में चिकन खाने वाले व्यक्ति के बीमार होने पर उस पर संबंधित एंटीबायोटिक बेअसर साबित होगी।

पहले भी हुए खुलासे

  • साल 2014 में सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वॉयरमेंट की रिपोर्ट में 40% चिकन में एंटीबायोटिक दवाएं पाई गईं थीं।
  • जुलाई 2016 में सर्वे एजेंसी ब्लूमबर्ग ने देश के 14 बड़े पॉल्ट्री फार्म की जांच की। इस रिपोर्ट में भी घातक स्तर तक एंटीबायोटिक डोज देने की बात सामने आई थी।

जिला पशु चिकित्साधिकारी प्रेम सिंह के अनुसार, एंटीबायोटिक के इस्तेमाल के लिए कोई रेग्युलेशन नहीं है। स्वास्थ्य के लिहाज से नुकसानदायक होने के कारण यूरोपीय देशों में इन्हें बैन किया गया है, लेकिन देश में नियम न होने के कारण इनका इस्तेमाल नहीं रोका जा सकता।

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