आज का सुविचार :चाणक्य निति के अनुसार ,राजनीति में कौन होता है सच्चा मित्र

चाणक्य सूत्र के मुताबिक -यह अनिवार्य है की राज्याभिलाषी लोग अपने कर्तव्यों का पालन अधिक क्षमता के साथ करें। लेकिन इसके लिए राज्य के पदाधिकारियों को अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना सीखना होगा साथ ही अपनी आंतरिक क्षमता का विकास करना होगा। चाणक्य का यह भी कहना है कि हर मित्रता के पीछे कोई न कोई स्वार्थ छिपा होता है यह एक कड़वा सत्य है।

आत्मवर्गं परित्यज्य परवर्गं समाश्रयेत।
स्वयमेव लयं याति यथा राजाsन्यधर्मतः।।

अर्थात,जो मनुष्य अपने वर्ग के लोगों को छोड़कर दूसरे वर्ग का सहारा लेता है ,वह उसी प्रकार स्वयं नष्ट हो जाता है जैसे अधर्म का आश्रय लेने वाला राजा।

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणं छेदनतापताडनैह।
तथा चतुर्भिः पुरुषं परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

अर्थात,चाणक्य निति के पांचवे अध्याय के दूसरे श्लोक के अनुसार सोने को परखने के लिए उसे रगड़ा जाता है ,काटकर देखा जाता है ,आग में तपाया जाता है ,पीटकर देखा जाता है कि सोना शुद्ध है या नहीं। सोने में मिलावट होती है तो इन चार कामों से वह सामने आ जाती है। इसी तरह किसी भी व्यक्ति के भरोसेमंद होने का पता आप इन चार बातों के आधार पर लगा सकते है।

पहला यह कि उस व्यक्ति में त्याग भावना कितनी है। क्या वह दूसरों की ख़ुशी के लिए अपने सुख का त्याग कर सकता है। फिर उसका चरित्र देखना चाहिए। यानी दूसरों के लिए वो इंसान क्या भावनाएं रखता है। तीसरी बात उसके गुण एवं अवगुण देखने चाहिए और आखिर में उसके कर्मों पर ध्यान देना चाहिए। क्या सामने वाला गलत तरीकों में लिप्त होकर धन अर्जित तो नहीं कर रहा।

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