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संविधान में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकार की गारंटी : CJI सूर्यकांत

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को संकेत दिया कि शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार एक संवैधानिक गारंटी है जिसे नकारा नहीं जा सकता,वह शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने वाले एक अखिल भारतीय प्रोटोकॉल को विकसित करने पर विचार करेगा। अदालत ने यह भी कहा कि प्रोटोकॉल में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के लिए उचित स्थान प्रदान किया जाना चाहिए, साथ ही अधिकारियों को असामाजिक तत्वों से निपटने में सक्षम बनाया जाना चाहिए। ये टिप्पणियां उन याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई के दौरान सामने आईं, जिनमें पुलिस द्वारा की गई ज्यादतियों, जिनमें कथित NEET-UG पेपर लीक और शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली में अन्य अनियमितताओं के विरोध में प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल शामिल है, के आरोप लगाए गए हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, कॉलिन गोंसाल्वेस और विकास सिंह छात्रों पर कथित हमलों के लिए पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाले अलग-अलग याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए। दूसरी ओर, एक वकील ने एक अलग याचिका का हवाला दिया जिसमें एक अनियंत्रित भीड़ द्वारा पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों पर किए गए क्रूर हमलों का आरोप लगाया गया था। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की पीठ ने टिप्पणी की कि इस मुद्दे पर अखिल भारतीय स्तर पर विचार करने की आवश्यकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की “शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन करने के लिए एक प्रोटोकॉल होना चाहिए। इसके लिए उचित स्थान होना चाहिए। इसमें कोई बाधा नहीं है। लेकिन अगर कोई असामाजिक तत्व मौजूद है तो उससे निपटा जा सकता है। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि वह देश भर में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने वाले अनिवार्य दिशानिर्देश निर्धारित करने पर विचार कर रहा है। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की “यह पूरे भारत का सवाल है… प्रोटोकॉल में यह एकरूपता भी… इसके लिए जिम्मेदार लोग… किस तरह के अनिवार्य दिशानिर्देश… आत्म-अनुशासन पूरी प्रक्रिया का अभिन्न अंग है।

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