
सर्बिया की राजनीति में एक अप्रत्याशित और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुसिच ने संसदीय चुनावों में एक छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के सामने अपनी हार स्वीकार कर ली है। इस हार के साथ ही सर्बिया की राजनीति में 2014 से चला आ रहा उनका मजबूत एकाधिकार समाप्त हो गया है।
चुनाव के प्रारंभिक नतीजों से यह स्पष्ट हो गया है कि ‘स्टूडेंट लिस्ट’ नामक इस गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की है। वुसिच ने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में हार स्वीकार करते हुए बताया कि 250 सदस्यीय संसद में छात्र-समर्थित उम्मीदवारों को 135 से 140 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि उनकी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी केवल 105 सीटों तक ही सीमित रह जाएगी। इस ऐतिहासिक चुनाव में लगभग 70 प्रतिशत मतदान हुआ, जो 1992 के बाद सबसे अधिक है। इस अभूतपूर्व जीत की घोषणा के तुरंत बाद राजधानी बेलग्रेड की सड़कों पर हजारों लोग जश्न मनाने के लिए उमड़ पड़े।
यह छात्र आंदोलन रातों-रात खड़ा नहीं हुआ है। इसकी शुरुआत 2024 में नोवी साद शहर के एक रेलवे स्टेशन पर हुए दर्दनाक हादसे से हुई थी, जहां स्टेशन की छतरी गिरने से 16 लोगों की जान चली गई थी। इस त्रासदी के बाद पूरे देश में भ्रष्टाचार और जवाबदेही को लेकर लगभग दो वर्षों तक भारी विरोध प्रदर्शन हुए। दिलचस्प बात यह है कि ‘स्टूडेंट लिस्ट’ पार्टी ने चुनावों में केवल छात्रों को मैदान में नहीं उतारा था।
इसके बजाय, यह नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक मंच है, जिसे छात्र संगठनों का व्यापक समर्थन प्राप्त है। इस गठबंधन में शिक्षाविद, अभिनेता और किसान शामिल हैं और इसके प्रमुख उम्मीदवार इलिजा सर्दानोविक हैं, जो 56 वर्षीय हृदय रोग विशेषज्ञ और विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हैं। इस दल का मुख्य उद्देश्य भ्रष्टाचार से निपटना, कानून का शासन मजबूत करना और शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाना है।
सर्बिया के ये चुनाव परिणाम ऐसे समय में आए हैं जब पूरे यूरोप में छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी लहर उठी हुई है। फ्रांस में शिक्षक की कमी, खचाखच भरी कक्षाओं और महंगाई को लेकर छात्रों और ट्रेड यूनियनों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया है, जिसमें लाखों लोग सड़कों पर उतरे और कई शहरों में हिंसा व गिरफ्तारियां भी हुईं।
इसी तरह, इटली में भी शिक्षा बजट और सरकारी नीतियों को लेकर छात्रों ने उग्र प्रदर्शन किए, जहां मिलान में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें भी देखने को मिलीं। इसके अलावा, अल्बानिया में भी हजारों युवा भ्रष्टाचार और विवादास्पद विकास परियोजनाओं को लेकर प्रधानमंत्री एडी रामा के इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतरे हैं।
अब सर्बिया के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि नई सरकार का नेतृत्व कौन करेगा और यह जन-आंदोलन अपने सुधारवादी एजेंडे को कैसे लागू करेगा। लगभग 66 लाख की आबादी वाले इस देश की नई सरकार को न केवल घरेलू चुनौतियों से निपटना होगा, बल्कि चीन, रूस और यूरोपीय संघ के साथ सर्बिया के जटिल कूटनीतिक और आर्थिक रिश्तों में भी संतुलन बनाना होगा।
यूरोप भर में छात्रों की मांगें भले ही अलग-अलग हों, लेकिन सर्बिया के चुनाव ने यह साबित कर दिया है कि स्थापित राजनीतिक संरचनाओं को चुनौती देने के लिए युवाओं में बढ़ती इच्छाशक्ति अब केवल सड़कों तक सीमित नहीं है। अब यह देखना बेहद अहम होगा कि विरोध प्रदर्शनों की यह ऊर्जा एक प्रभावी शासन और सुदृढ़ लोकतंत्र में कैसे तब्दील होती है।


