
नोबेल शांति पुरस्कार 2026 की घोषणा का समय अब बेहद करीब आ गया है, और इसी के साथ दुनिया भर में संभावित विजेताओं के नामों को लेकर अटकलों और चर्चाओं का बाजार भी गर्म हो चुका है।मौजूदा समय में जब विश्व के कई हिस्से, विशेषकर सूडान, यूक्रेन और मध्य पूर्व, गंभीर तनाव तथा मानवीय संकट के दौर से गुजर रहे हैं, तब इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के मायने और भी अहम हो जाते हैं।
इस साल नोबेल समिति के पास कुल 287 उम्मीदवारों के नामांकन पहुंचे हैं, जिनमें 208 प्रमुख हस्तियां और 79 विभिन्न संगठन शामिल हैं।हालांकि, नॉर्वेजियन नोबेल कमेटी के सख्त नियमों के अनुसार इन नामांकनों की आधिकारिक सूची को 50 वर्षों तक पूरी तरह से गोपनीय रखा जाता है। ऐसे में वर्तमान में चल रही सभी चर्चाएं विभिन्न विशेषज्ञों और शांति अनुसंधान संस्थानों के अनुमानों पर ही आधारित हैं। पुरस्कार के विजेता के नाम से 9 अक्टूबर 2026 को सुबह 11 बजे नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में पर्दा उठेगा।
इस बार संभावित दावेदारों की जो सूचियां सामने आ रही हैं, उनमें सबसे चौंकाने वाला और दिलचस्प नाम ‘इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन’ (ISS) का है।पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट ओस्लो (PRIO) के कार्यवाहक निदेशक हाकॉन गेरलॉव द्वारा जारी की गई संभावित सूची में इस अंतरिक्ष स्टेशन को विशेष स्थान दिया गया है। इसके पीछे मुख्य तर्क यह है कि ISS दशकों से अमेरिका और रूस जैसे भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच अद्वितीय वैज्ञानिक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का एक जीता-जागता प्रतीक रहा है।
इसने यह साबित किया है कि पृथ्वी पर देशों के बीच राजनीतिक संबंध कितने भी तनावपूर्ण क्यों न हों, अंतरिक्ष में शांतिपूर्ण और साझा विकास संभव है। इसे 2030 के दशक की शुरुआत में सेवामुक्त करने की योजना है, इसलिए इसके ऐतिहासिक योगदान को सम्मानित करने का यह सही समय माना जा रहा है।
राजनीतिक और वैश्विक नेतृत्व के क्षेत्र से भी कई नाम चर्चा का विषय बने हुए हैं।अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर नोबेल शांति पुरस्कार की दौड़ में अपना नाम होने की उम्मीद कर रहे हैं, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के साथ मौजूदा तनाव और संघर्ष को देखते हुए उनकी राह आसान नहीं है।पिछली बार की विजेता मारिया कोरीना मचाडो द्वारा अपना पदक ट्रंप को सौंपे जाने की घटना ने भी इस साल नोबेल कमेटी के फैसलों पर दबाव के सवाल खड़े किए हैं।
वहीं, दूसरी ओर कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का नाम भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनकी सक्रियता और ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों के सामने मजबूती से खड़े रहने के कारण संभावित विजेताओं में गिना जा रहा है। इसके साथ ही, युद्ध और कूटनीति के मुद्दों पर संवाद व शांतिपूर्ण समाधान की लगातार वकालत करने वाले धर्मगुरु पोप लियो का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और संघर्ष क्षेत्रों में काम करने वाले संगठनों व व्यक्तियों को भी इस बार प्रबल दावेदार माना जा रहा है। इनमें इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (ICJ) और इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC) दोनों का नाम शामिल है, जो वैश्विक मंच पर कानूनी विवादों को सुलझाने और युद्ध अपराधों के लिए जवाबदेही तय करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा, ऑक्यूपाइड फिलिस्तीनी टेरिटरीज के लिए संयुक्त राष्ट्र की विशेष रिपोर्टर फ्रांसेस्का अल्बानीज का नाम गाजा और वेस्ट बैंक में मानवाधिकारों को लेकर उनके मुखर रुख की वजह से चर्चा में है।
युद्ध प्रभावित इलाकों में बच्चों की सुरक्षा के लिए ‘सेव यूक्रेन’ के संस्थापक मायकोला कुलेबा और ‘सेव द चिल्ड्रन’ संस्था, सूडान के संघर्ष में नागरिकों को भोजन व चिकित्सा मुहैया कराने वाले ‘इमरजेंसी रिस्पॉन्स रूम्स’, और दुनियाभर में पत्रकारों की आवाज की रक्षा करने वाली संस्था ‘कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ (CPJ) भी शांति पुरस्कार के योग्य उम्मीदवारों के तौर पर देखे जा रहे हैं।
नोबेल शांति पुरस्कार के इतिहास में महिला विजेताओं की भागीदारी को लेकर भी इस बार विशेष नजर रखी जा रही है। संभावित नामों में कुछ बेहद साहसी महिलाओं का जिक्र भी हो रहा है, जिनमें युद्ध की विभीषिका के बीच गाजा में लोगों की जान बचाने वाली सर्जन सारा अल-सक्का और रूस के दिवंगत विपक्षी नेता अलेक्सी नवलनी की पत्नी यूलिया नवलनाया प्रमुख हैं।
यह सभी नाम भले ही वैश्विक पटल पर उम्मीद की किरण जगाते हों, लेकिन अंतिम सत्य यही है कि नोबेल कमेटी शांति, संघर्ष समाधान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के तमाम मापदंडों को परखने के बाद ही विजेता का चुनाव करती है।फिलहाल पूरी दुनिया की निगाहें 9 अक्टूबर की उस ऐतिहासिक घोषणा पर टिकी हैं, जो यह तय करेगी कि इस साल का शांति दूत होने का सर्वोच्च सम्मान किसे प्राप्त होता है।




