संस्कृति की नगरी वाराणसी में कुम्हारों ने दिखाया अपना हुनर, पर्यटकों को लुभा रहे मिट्टी के बर्तन

VARANASI

कच्ची मिटटी पर जब कुम्हार के सधे, पक्के हाथों की छुअन पड़ती है , तब जाकर पेट की भूख और गरीबी की लाचारी से मिटटी के एक ढांचे का जन्म होता है। “हाथों में हुनर इतना की मिटटी से दुनिया रोशन कर दें लेकिन खुद के घर को रोशन करने के लिए दिवाली का इंतजार करना पड़ता है।  जी हाँ  हम बात कर रहे हैं कुम्हारों की जो गरीबी और बेरोजगारी से जूझते हैं और किसी से कह भी नहीं पाते। इन्ही कुम्हारों के पास एक ऐसी कला भी है जिसे देशी विदेशी पर्यटक खासा पसंद करते हैं। देखिये एक रिपोर्ट-

कला और संस्कृति की नगरी वाराणसी में कुम्हारों द्वारा मिटटी के बीड्स के डिजाइनर सजावट के सामान बनाये जाते हैं जिसे मंदिरों , डाइनिंग रूम , हाल, घर या ऑफिस के मुख्य द्वार पर लगाए जाते हैं। देखने से ये प्लास्टिक या लकड़ी के बने लगते हैं लेकिन ये मिटटी के बने होने की वजह से पर्यटकों को और भी लुभाते हैं। पर्यटक मानते हैं कि मिटटी के बने इन सजावटी समानों से घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है और वास्तु दोष दूर होता है। वातावरण को जिवंत बनाने वाली इस कला को बहुत कम लोग जानते और पहचानते हैं।

मिट्टी के बीज

ये तस्वीरें वाराणसी शहर से दूर कंदवा गांव की है जहाँ कुम्हार इन दिनों मिटटी के बीड्स के सजावटी सामान बना रहे हैं। मिटटी की छोटी छोटी गोलियों पर बारीकी से डिजाइन बनाकर इन्हे सुखाया जाता है इसके बाद इन्हे पकाते हैं और फिर इन्हे पेण्ट किया जाता है। तैयार माल को लड़ियों में पिरोकर इन्हे बाजार में बेचा जाता है। इसमें देवी देवताओं की लकड़ी से बनी मूर्तियां और छोटी छोटी घण्टियाँ भी लगाई जाती हैं जिससे मधुर आवाज़ आती है।

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कुम्हारों द्वारा इन मिटटी के बीड्स को बनाने के ज्यादा पैसे भी नहीं मिलती। 100 बीड्स बनाने के मात्र10 रुपये मिलते हैं और लगभग 2 महीने माल तैयार करके इकठ्ठा बेचने पर इन्हे भुगतान किया जाता है। इसके वजह से इन्हे घर का खर्च चलाने में काफी दिक्कतें होती हैं। मिटटी के दिए और खिलौनों की बिक्री काफी कम हो चुकी है ऐसे में बीड्स के सजावटी सामान बनाकर बेचने से इन्हे कुछ मदद तो मिलती है लेकिन ये भी नाकाफी है। कुम्हारों का कहना है की कुछ लोग सरकारी तंत्र का हवाला देकर सर्वे करने आते हैं और योजनाओं की बयार दिखाकर फोटो खिंचाते हैं और आश्वासन दे जाते हैं लेकिन दोबारा नहीं आते।

अगर इन हस्त शिल्प कलाओं को बढ़ावा दिया जाय तो मिटटी के बने बीड्स, ग्लास बीड्स और प्लास्टिक बीड्स से ज्यादा प्रभावी साबित होंगे क्योंकि इसमें भारतीय सभ्यता और संस्कृति की झलक मिलती है। बस जरुरत है सरकारी योजनाओं को बिना देरी किये इन तक पहुँचाने की।

 

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