
कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है कि 2023 में वन (संरक्षण) अधिनियम में किए गए संशोधनों ने जंगलों के प्रबंधन के निजीकरण का रास्ता खोल दिया है। पार्टी का कहना है कि यह बदलाव देश की वन नीति और पर्यावरण संरक्षण के लिए बड़ा खतरा है।
जयराम रमेश का बयान
कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने 7 जनवरी 2026 को एक्स पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के 2 जनवरी के सर्कुलर का स्क्रीनशॉट साझा किया। उन्होंने कहा, “अगस्त 2023 में मोदी सरकार ने वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 में संशोधन संसद में जबरन पास कराए थे। कानून का नाम बदलकर वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम करने के अलावा इसमें वनों के शासन में दूरगामी बदलाव किए गए।”
रमेश ने आगे कहा, “उस समय ही चेतावनी दी गई थी कि ये संशोधन जंगल प्रबंधन के निजीकरण का दरवाजा खोलेंगे। अब यही हो रहा है, जैसा कि मंत्रालय के 2 जनवरी 2026 के सर्कुलर से साबित होता है।” यह सर्कुलर वन भूमि को लीज पर देने की गाइडलाइंस में संशोधन से जुड़ा है, जिसमें पुनर्स्थापन और सस्टेनेबल हार्वेस्ट के लिए नए प्रावधान जोड़े गए हैं।
2023 संशोधन की पृष्ठभूमि
2023 के संशोधनों में वन भूमि की परिभाषा स्पष्ट की गई, कुछ श्रेणियों की भूमि को छूट दी गई और गैर-वानिकी गतिविधियों (जैसे इको-टूरिज्म, सुरक्षा परियोजनाएं) को आसान बनाया गया। विरोधियों का मानना है कि इससे निजी कंपनियों को वन भूमि लीज पर लेने में आसानी होगी, जबकि सरकार इसे विकास और कार्बन सिंक बढ़ाने की जरूरत बताती है।
कांग्रेस का कहना है कि ये बदलाव आदिवासी अधिकारों और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाएंगे। यह मुद्दा पर्यावरण संरक्षण बनाम विकास की बहस को फिर से गरमा रहा है।





