भयानक वास्तु दोषों के दुष्प्रभाव से बचने के उपाय

वास्तु शास्त्र घर, प्रासाद, भवन अथवा मन्दिर निर्मान करने का प्राचीन भारतीय विज्ञान है जिसे आधुनिक समय के विज्ञान आर्किटेक्चर का प्राचीन स्वरुप माना जा सकता है। उत्तर, दक्षिण, पूरब और पश्चिम ये चार मूल दिशाएं हैं। वास्तु विज्ञान में इन चार दिशाओं के अलावा 4 विदिशाएं हैं। आकाश और पाताल को भी इसमें दिशा स्वरूप शामिल किया गया है।

वास्तु शास्त्र

इस प्रकार चार दिशा, चार विदिशा और आकाश पाताल को जोड़कर इस विज्ञान में दिशाओं की संख्या कुल दस माना गया है। मूल दिशाओं के मध्य की दिशा ईशान, आग्नेय, नैऋत्य और वायव्य को विदिशा कहा गया है।

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वास्तु दोषों को पूर्ण रूप से दूर करने के लिए हमें निर्माण अथवा परिवर्तन करना आवश्यक है, क्योंकि मकान में उत्तर-पश्चिम तथा पूर्व और ईशान कोण (उत्तर-पूर्व भाग), आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण भाग) सबसे ऊंचे तथा भारी करना और दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य) कोण एवं पश्चिमी दिशा नीची, गहरी, कुआं, गड्ढे होना, वास्तु की दृष्टि से सबसे बड़ा दोष है, अत: भवन का निर्माण करते समय इन दोषों को टालना अत्यंत अनिवार्य है, अन्यथा ऐसे दोषयुक्त भवनों में रहने से पड़ोसी लोगों में आपसी प्रेम, समन्वय व शांति की भावना कम होती है। अनहोनी घटनाएं होने से, स्वास्थ्य प्रतिकूल रहने से तनावपूर्ण वातावरण बना रहता है।

मकान में ईशान कोण वाली (पूर्व-उत्तर) दिशा में पानी का हौज बनाने से विभिन्न प्रकार के भयंकर वास्तु दोषों के दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। यदि किसी मकान के दक्षिण-पश्चिम में कुआं है, तो पहले उस कुएं का पानी ईशान कोण में बनाई गई टंकी में डालकर, फिर पीने वाले शुद्ध पानी का इस्तेमाल करना चाहिए।

मकान के दक्षिण-पश्चिम भाग में भारी सामान रखने तथा छत पर निर्माण कार्य करवा कर उसे भवन का सबसे ऊंचा भाग बनाने से भी वास्तु दोष प्रभावहीन होने लगते हैं। जब तक उपर्युक्त निर्माण न हो सके तब तक दक्षिण-पश्चिम की दिशा में केबल टी.वी. का एंटीना लगाकर उस भाग को सबसे ऊंचा बनाया जा सकता है।

यदि भवन में कोई भाग वास्तु नियमों के प्रतिकूल बनाया गया हो तथा उस कमरे में दरवाजे के सामने दरवाजे अथवा खिड़कियां बनाना संभव न हो, तब उस कमरे के दरवाजे की बंद दीवार पर दर्पण, महकते फूलों अथवा मनभावन प्राकृतिक दृश्यों के चित्र टांगने से उस दरवाजे से होकर गुजरने वाले प्रत्येक व्यक्ति का ऊर्जा-चक्र पूरा हो जाता है, जिससे वास्तु के दुष्प्रभावों से काफी हद तक बचा जा सकता है।

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घर के प्रत्येक कमरे के ईशान कोण को खाली रखने, दक्षिण-पश्चिम कोण पर भारी सामान एवं वस्तुएं रखने तथा जो दरवाजे या खिड़कियां सृजनात्मक दिशाओं में नहीं हैं, उन्हें बंद रखने अथवा कम उपयोग में लाने से भी वास्तु दोषों का दुष्प्रभाव कम होने लगता है।

मकान में सृजनात्मक वातावरण बनाए रखने, नियमित स्वाध्याय, प्रार्थन करने, अनुपयोगी नकारात्मक दृश्यों के चित्र, पेंटिंग, जानवरों के माडल हटाकर उस स्थान पर सकारात्मक प्रेरणादायक चित्र लगाने से वास्तु दोषों का प्रभाव कम हो जाता है।

मकान में पिरामिड बनाने से भी वास्तु दोषों का प्रभाव बहुत हद तक कम होने लगता है। जातक का स्वास्थ्य सुधरता है, क्योंकि पिरामिड विशिष्ट ऊर्जा का स्रोत होने के कारण जातक की अन्य समस्याओं से भी रक्षा करता है।

रंग चिकित्सा के अनुसार, हमारे स्वास्थ्य पर अलग-अलग रंगों का अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। जनसाधारण के लिए दीवारों पर सफेद रंग सबसे अच्छा है, जिसका कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता। जहां तक हो सके दीवारों पर लाल, काले तथा ग्रे रंग का उपयोग न करें।

लाल रंग शक्तिशाली रंग है, जबकि काला और बादली रंग नकारात्मक हैं। गुलाबी अथवा नारंगी रंग, रसोई, डाइनिंग और ड्राइंग रूम में तथा हरा रंग अध्ययन कक्ष में, नीला रंग शयन कक्ष में तथा वायलेट रंग पूजा कक्ष में दीवारों पर होने से अनुकूल प्रभाव पड़ता है। तनाव मुक्ति एवं शांति के लिए शयन कक्ष में नीला बल्ब लगाने से भी लाभ होता है।

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कहने का तात्पर्य यही है कि वास्तु के नियमों के अनुसार बने हुए भवनों में रहने अथवा कार्य करने से अपेक्षित लाभ होता है तथा प्रमुख लक्ष्यों को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, जिससे जीवन शांत, सुखी, तनावमुक्त व विकासोन्मुखी हो जाता है।

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