वैज्ञानिकों ने खोजी नई टेक्नॉलजी, बिना चीर-फाड़ होगा पोस्टमॉर्टम

उस परिवार पर क्या बीतती होगी, जिसका कोई अपना किसी ऐक्सिडेंट में मर जाए या फिर सुइसाइड कर ले। उस दुख का अंदाजा लगाना तब और मुश्किल है जब उसी मृत व्यक्ति का पोस्टमॉर्टम किया जाए। प्रियजन की ऑटोप्सी की इजाज़त भी नहीं देते। हालांकि अब ऐसा नहीं होगा।

एम्स और आईसीएमआर अब एक ऐसी टेक्नॉलजी के साथ प्रयोग कर रहे हैं, जिसमें ऑटोप्सी को वर्चुअल तरीके से किया जाएगा। यानी अब ऑटोप्सी के दौरान न तो मृत व्यक्ति के शरीर पर किसी तरह का चीर-फाड़ का निशान होगा और न ही इससे उसके घरवालों की भावनाएं आहत होंगी। एम्स के प्रोफेसर और फोरेंसिक मेडिसिन के डॉक्टर सुधीर गुप्ता ने बताया कि कई परिवार वाले इस प्रक्रिया के लिए तैयार नहीं होते। चूंकि ऑटोप्सी पुलिस जांच की एक अभिन्न प्रक्रिया है इसलिए इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता है।

इसलिए डॉ़ गुप्ता और उनकी टीम इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के साथ मिलकर एक ऐक्सपेरिमेंट करने जा रही है, जिसमें ऑटोप्सी को वर्चुअली कंडक्ट किया जाएगा। बता दें कि इस प्रक्रिया को स्विटजरलैंड के अलावा कई पश्चिमी देशों में पहले से फॉलो किया जा रहा जा रहा है।

जैसा कि नाम से ही जाहिर है, इसमें इसमें मृत शरीर में आंतरिक अंगों, टिशूज़ और हड्डियों को बिना छुए जांचा जाता है। शरीर को एक बैग में पैक किया जाता है, जिसे बाद में एक सीटी स्कैन मशीन में रखा जाता है और फिर कुछ सेकंड के भीतर, आंतरिक अंगों की हजारों छवियां कैप्चर की जाती हैं, जिनका आगे फरेंसिक विशेषज्ञों द्वारा विश्लेषण किया जाता है।

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एम्स हर साल लगभग 3,000 ऑटोप्सी करता है। मामले की जटिलता और विशेषज्ञों की उपलब्धता के आधार पर, ऑटोप्सी करने में 30 मिनट से तीन तक का समय लग जाता है।

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